Sharmistha Mukherjee : पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी और लेखिका शर्मिष्ठा मुखर्जी ने हाल ही में अपने पिता की डायरी के माध्यम से भारतीय राजनीति के कई अनकहे पहलुओं पर प्रकाश डाला है। उन्होंने बताया कि प्रणब मुखर्जी ने अपनी डायरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से की है। उनके अनुसार, इंदिरा गांधी के बाद नरेंद्र मोदी ही एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो देश की जनता की नब्ज को गहराई से समझते हैं। यह टिप्पणी तब लिखी गई थी जब मोदी ने जम्मू-कश्मीर में बाढ़ के दौरान सियाचिन का दौरा किया और बाढ़ पीड़ितों के साथ दिवाली मनाई थी। प्रणब दा उनके इस मानवीय और संवेदनात्मक दृष्टिकोण से काफी प्रभावित थे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने मोदी की विदेश नीति को तेजी से समझने और उसे जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करने की क्षमता की भी जमकर तारीफ की थी।

आरएसएस मुख्यालय जाने पर दी थी यह अहम प्रतिक्रिया
शर्मिष्ठा मुखर्जी ने वर्ष 2018 में अपने पिता के नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय जाने के विवादास्पद फैसले पर भी चर्चा की। उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय वे कांग्रेस की सक्रिय राजनीति में थीं और पिता के इस निर्णय से बेहद नाराज थीं। जब उन्होंने अपने पिता से कहा कि आरएसएस जाकर वे संगठन को वैधता प्रदान कर रहे हैं, तो प्रणब मुखर्जी ने कड़े शब्दों में उन्हें टोका। उन्होंने कहा था, “आरएसएस को वैधता देश की जनता ने दी है, जिसने उनके एक स्वयंसेवक को भारी बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बनाया है।” प्रणब दा का मानना था कि लोकतंत्र संवाद पर आधारित है और कांग्रेस को धरातल की इस सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए, अन्यथा यह पार्टी के लिए घातक सिद्ध होगा।

मोदी और प्रणब दा के बीच थे बेहद गहरे और निजी संबंध
शर्मिष्ठा ने खुलासा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके पिता के संबंध राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री के संवैधानिक पद से कहीं बढ़कर थे। मोदी ने स्वयं उन्हें बताया था कि जब वे गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले एक सामान्य आरएसएस कार्यकर्ता के तौर पर दिल्ली आते थे, तब अक्सर सुबह की सैर के दौरान उनकी मुलाकात प्रणब मुखर्जी से होती थी। मोदी ने उनके प्रति हमेशा गहरा सम्मान व्यक्त किया और कहा कि वे हमेशा ‘दादा’ के पैर छूकर आशीर्वाद लिया करते थे। डायरी के अनुसार, जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और राष्ट्रपति भवन में प्रणब मुखर्जी से मिलने आते थे, तब वे यूपीए सरकार के मुखर आलोचक होने के बावजूद विनम्रता के साथ उनका सम्मान करना नहीं भूलते थे।
संसद में संवाद की अहमियत और विपक्ष की जिम्मेदारी
प्रणब मुखर्जी हमेशा ‘सहमति बनाने वाले’ नेता के रूप में याद किए जाएंगे। शर्मिष्ठा के अनुसार, उनके पिता सीपीआई, सीपीएम और भाजपा सहित सभी दलों के नेताओं के साथ मधुर संबंध बनाए रखते थे। वे मानते थे कि विपक्ष का मुख्य काम संसद को बाधित करना नहीं, बल्कि सार्थक बहस करना है। उन्होंने संस्मरण में बताया कि जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय कांग्रेस विपक्ष में थी, तब भी प्रणब मुखर्जी ने सोनिया गांधी को संसद न ठप करने की सलाह दी थी। आज के दौर में सरकार और विपक्ष के बीच संवादहीनता पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए दोनों पक्षों को टकराव छोड़कर बीच का रास्ता निकालना चाहिए, क्योंकि संसद ही लोकतंत्र की वास्तविक जीवनरेखा है।
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