Shashi Tharoor Absence
Shashi Tharoor Absence: कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संसद के मौजूदा सत्र की समीक्षा के लिए अपने सांसदों की एक बैठक बुलाई थी, लेकिन सबकी निगाहें एक नाम पर टिकी थीं—केरल के तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर। थरूर इस बैठक में शामिल नहीं हुए, और यह पहली बार नहीं है जब वह पार्टी की महत्वपूर्ण बैठकों से नदारद रहे हों। हालांकि, हर बार की तरह उन्होंने इस बार भी बैठक में न आने का कारण पार्टी को सूचित कर दिया था।
शशि थरूर बीते तीन हफ्तों में कांग्रेस की तीन अहम बैठकों से गैर-हाजिर रहे हैं, हालांकि तीनों ही बार उन्होंने पार्टी को पूर्व सूचना दे दी थी:
18 नवंबर: राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे की SIR (सत्र समीक्षा) पर बैठक। इसमें थरूर ने खराब तबीयत का हवाला दिया। हालांकि, एक दिन पहले ही वह पीएम मोदी के कार्यक्रम में शामिल हुए थे और सोशल मीडिया पर उनके भाषण की तारीफ भी की थी।
30 नवंबर: संसद की रणनीति बनाने के लिए सोनिया गांधी की अध्यक्षता में हुई स्ट्रेटेजी ग्रुप की बैठक। इसमें उन्होंने अपनी माँ के साथ केरल में होने का हवाला दिया।
12 दिसंबर: लोकसभा सांसदों के साथ राहुल गांधी की बैठक। इसमें भी उन्होंने केरल में होने के कारण अनुपस्थित रहने की जानकारी दी।
चूंकि थरूर हर बार पूर्व सूचना दे देते हैं, इसलिए तकनीकी आधार पर ये सभी जायज़ कारण माने जाते हैं और पार्टी उन पर कोई कार्रवाई भी नहीं कर सकती। यदि वह बिना बताए अनुपस्थित रहते, तो पार्टी उन्हें नोटिस भेज सकती थी। थरूर पिछली बार 28 अक्टूबर को कांग्रेस मुख्यालय में केरल कांग्रेस की बैठक में नज़र आए थे।
कांग्रेस पार्टी थरूर को तब से संदेह की नज़र से देख रही है जब उन्हें सरकार द्वारा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद विदेश जाने वाले सांसदों के प्रतिनिधिमंडल का मुखिया बनाकर अमेरिका भेजा गया था। सबसे बड़ा सवाल यह है कि थरूर कांग्रेस की बैठकों से तो दूर रहते हैं, लेकिन अन्य समारोहों और कार्यक्रमों में जाने से उन्हें परहेज़ नहीं होता। उनके लगातार बैठकों में न आने, उनके सोशल मीडिया पोस्ट और अन्य बयानों पर कांग्रेस नेतृत्व अक्सर चुप ही रहता है, या कभी-कभी अपने किसी नेता से थरूर के ख़िलाफ़ बयान दिलवा देता है।
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि शशि थरूर द्वारा कांग्रेस की बैठकों का एक तरह से बहिष्कार करने और लगातार बयानों के बावजूद पार्टी कोई बड़ी कार्रवाई क्यों नहीं करती? जबकि थरूर ने कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव तक मल्लिकार्जुन खरगे के ख़िलाफ़ लड़ा था। इसके बावजूद, उन्हें कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) का सदस्य बनाया गया था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस केरल की अंदरूनी राजनीति की वजह से थरूर को नहीं छेड़ना चाहती है। थरूर और राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले के सी वेणुगोपाल के बीच आपसी मनमुटाव जगजाहिर है।
कांग्रेस जानती है कि थरूर केरल में एक लोकप्रिय नेता हैं। राज्य में स्थानीय निकाय के चुनाव होने वाले हैं और इसके बाद विधानसभा चुनाव भी होने हैं। अगर पार्टी थरूर पर कार्रवाई करती है या उन्हें बाहर निकालती है, तो वह लोकसभा सांसद बने रहेंगे और रोज़ कांग्रेस को शर्मिंदा करने का कोई अवसर नहीं छोड़ेंगे। थरूर खुद केरल में कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री का चेहरा बनना चाहते हैं, लेकिन पार्टी इसके लिए तैयार नहीं है। यही कारण है कि थरूर को छेड़ने का जोखिम कांग्रेस मोल नहीं लेना चाहती, जिससे शशि थरूर कांग्रेस के लिए ऐसी स्थिति बन गए हैं कि पार्टी उन्हें ‘ना उगलते बन रहा है और ना ही निगलते’।
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