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Tharoor China Dispute: चीन विवाद और नरवणे की किताब, शशि थरूर ने सरकार को घेरा, कहा चर्चा से डरना लोकतंत्र के लिए घातक

Tharoor China Dispute: संसद के बजट सत्र में आज उस समय भारी बवाल मच गया जब विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित किताब के हवाले से वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीनी टैंकों की मौजूदगी का मुद्दा उठाया। इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई, जिसके परिणामस्वरूप सदन की कार्यवाही को अगले दिन तक के लिए स्थगित करना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर की महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया सामने आई है। थरूर ने सरकार के रवैये की आलोचना करते हुए कहा कि सदन को इस तरह ठप करना तर्कसंगत नहीं था।

सरकार की अति-प्रतिक्रिया: “जो सार्वजनिक है उस पर आपत्ति क्यों?”

शशि थरूर ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि सरकार की ओर से इस मुद्दे पर जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया (Overreaction) दी गई। उन्होंने तर्क दिया कि राहुल गांधी जिस ‘कारवां’ मैगजीन के लेख का हवाला दे रहे थे, वह पहले से ही ‘पब्लिक डोमेन’ में उपलब्ध है। थरूर के अनुसार, “सरकार को इस तकनीकी बात पर आपत्ति नहीं जतानी चाहिए थी कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है। जब मैगजीन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और कोई भी उसे पढ़ सकता है, तो राहुल जी को अपनी बात रखने देना चाहिए था।” उन्होंने कहा कि सरकार के अड़ियल रुख ने दोपहर के सत्र को बेवजह बाधित कर दिया।

तथ्यों का जवाब तथ्यों से दें: संसदीय परंपरा का हवाला

प्रख्यात विद्वान और सांसद थरूर ने संसदीय लोकतंत्र की गरिमा पर जोर देते हुए कहा कि संसद चर्चा और बहस के लिए ही बनी है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि सरकार को लगता है कि राहुल गांधी द्वारा पेश किए गए तथ्य गलत हैं, तो सबसे सही तरीका उन तथ्यों को सुधारना और सही जानकारी देना है, न कि चर्चा को ही रोक देना। थरूर ने कहा, “तथ्यों को सामने आने से रोकना समाधान नहीं है। सरकार को अपनी बात स्पष्ट करनी चाहिए थी और बातचीत को बढ़ावा देना चाहिए था।” उनके अनुसार, यह मुद्दा सेना के खिलाफ नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के रणनीतिक फैसलों के बारे में था।

नेहरू काल की याद: युद्ध के दौरान भी होती थी चर्चा

ऐतिहासिक संदर्भों का जिक्र करते हुए शशि थरूर ने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय की संसदीय परंपराओं की याद दिलाई। उन्होंने बताया कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान भी संसद में प्रतिदिन बहस होती थी। थरूर ने कहा, “उस समय कोई व्हिप नहीं था और यहाँ तक कि सत्ता पक्ष के सांसद भी सरकार और प्रधानमंत्री की आलोचना कर सकते थे। 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान भी संसद सत्र सुचारू रूप से चले और देश को भरोसे में लिया गया।” उन्होंने सवाल उठाया कि वर्तमान सरकार चीन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा करने से क्यों कतरा रही है?

लोकतंत्र और पारदर्शिता: “सब कुछ छिपाना सही नहीं”

अंत में, शशि थरूर ने जोर देकर कहा कि चीन की सीमा पर जो कुछ भी हो रहा है, वह पूरे देश के लिए गहरी चिंता का विषय है। उन्होंने माँग की कि विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री को सदन में आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। थरूर ने कहा, “सब कुछ छिपा देना हमारे लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। यह संसद के कामकाज को भी प्रभावित करता है।” उन्होंने सरकार से अपील की कि वह चर्चा से डरने के बजाय पारदर्शिता अपनाए, ताकि देश को वास्तविक स्थिति का पता चल सके।

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