पश्चिम बंगाल

SIR Voter List Bengal: दागी अधिकारियों को बचाने की कोशिश? चुनाव आयोग ने खुद दर्ज कराई 5 पर FIR

SIR Voter List Bengal: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राज्य सरकार और केंद्रीय चुनाव आयोग के बीच टकराव गहराता जा रहा है। चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव मनोज पंत को एक कड़ा पत्र भेजकर ERO और AERO अधिकारियों के खिलाफ लंबित विभागीय कार्रवाई की वर्तमान स्थिति की जानकारी मांगी है। आयोग इस बात से नाराज है कि राज्य सरकार ने उन अधिकारियों के खिलाफ नरमी बरती है, जिन्हें आयोग ने गंभीर अनियमितताओं का दोषी पाया था। यह विवाद आने वाले चुनावों की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

नियमों का उल्लंघन: बिना आयोग की सलाह के अधिकारियों को दी गई ‘हल्की सजा’

केंद्रीय चुनाव आयोग के स्पष्ट नियम हैं कि चुनाव ड्यूटी के दौरान दोषी पाए गए अधिकारियों के खिलाफ किसी भी अनुशासनात्मक कार्रवाई को अंतिम रूप देने से पहले आयोग से अनिवार्य परामर्श करना जरूरी है। हालांकि, ममता सरकार के संबंधित विभागों ने आयोग की सलाह लिए बिना ही अपने स्तर पर फैसले कर दिए। आयोग का कहना है कि राज्य सरकार ने कुछ अधिकारियों को दोषमुक्त कर दिया है या उन्हें बहुत मामूली सजा दी है, जो नियमों का सीधा उल्लंघन है। आयोग ने सरकार के इस एकतरफा फैसले को ‘प्रक्रियात्मक रूप से गलत’ और अमान्य करार दिया है।

इन चार अधिकारियों पर गिरी गाज: मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप

जांच के दौरान चुनाव आयोग ने पाया कि पश्चिम बंगाल के चार निर्वाचन अधिकारी मतदाता सूची तैयार करने और पुनरीक्षण प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं में शामिल थे। इन अधिकारियों के नाम देबोत्तम दत्ता चौधरी, तथागत मंडल, बायोलोब सरकार और सुदीप्त दास (AERO, मोयना) हैं। 5 अगस्त को ही आयोग ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि इन चारों को तत्काल निलंबित किया जाए, विभागीय जांच शुरू हो और उनके खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए। हालांकि, राज्य सरकार ने इन निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं किया, जिससे आयोग की नाराजगी बढ़ गई।

मुख्य सचिव को दिल्ली तलब: आयोग ने कहा- ‘अमान्य है सरकार की कार्रवाई’

मामले की गंभीरता को देखते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव को दिल्ली बुलाया गया, जहां आयोग ने अपना रुख साफ किया। पत्र में कड़े शब्दों में कहा गया है कि चूंकि निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और आयोग से परामर्श नहीं लिया गया, इसलिए राज्य सरकार द्वारा की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को स्वीकार नहीं किया जाएगा। आयोग की दृष्टि में यह पूरी प्रक्रिया ‘अनियमित’ है और इसे ‘अमान्य’ माना जाएगा। अब राज्य सरकार को आयोग के निर्देशों के अनुसार इन मामलों पर कड़ाई से पुनर्विचार करना होगा।

जिम्मेदार अधिकारियों से मांगा लिखित जवाब: चूक के कारणों पर स्पष्टीकरण

चुनाव आयोग ने अब राज्य सरकार से एक विस्तृत रिपोर्ट मांगी है कि आखिर नियमों की अनदेखी के लिए कौन जिम्मेदार है और यह चूक क्यों हुई। आयोग ने उन अधिकारियों से भी लिखित जवाब मांगा है जिन्होंने परामर्श की प्रक्रिया को तोड़ा है। चारों दागी अधिकारियों के खिलाफ चल रही जांच का पूरा विवरण भी तलब किया गया है। आयोग ने निर्देश दिया है कि अगली उच्चस्तरीय बैठक से पहले पूरी जांच रिपोर्ट और सरकार का स्पष्टीकरण आयोग के पास पहुंच जाना चाहिए।

निष्पक्ष चुनाव के लिए आयोग की जीरो टॉलरेंस नीति

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग की यह सक्रियता दर्शाती है कि वह चुनावी प्रक्रियाओं में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। राज्य सरकार और आयोग के बीच का यह प्रशासनिक युद्ध आने वाले समय में राजनीतिक रंग भी ले सकता है। फिलहाल, ममता सरकार के लिए यह बड़ी चुनौती है कि वह आयोग के कड़े निर्देशों और अपनी प्रशासनिक स्वायत्तता के बीच कैसे संतुलन बिठाती है।

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