Solar Panel Technology: सोलर पैनल से बिजली बनाने के लिए सूर्य की रोशनी जरूरी होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बादल छाने या सीधी धूप न मिलने पर पैनल पूरी तरह काम करना बंद कर देते हैं। मानसून और सर्दियों में जब आसमान में बादल छाए रहते हैं, तब भी सोलर पैनल सीमित मात्रा में बिजली पैदा करते रहते हैं। हालांकि, रोशनी कम होने के कारण इनका आउटपुट तेज धूप की तुलना में घट जाता है। सूरज की रोशनी पूरी तरह खत्म होने के बाद ही सामान्य सोलर पैनल बिजली उत्पादन बंद करते हैं।

सोलर पैनल को गर्मी नहीं, रोशनी चाहिए
सोलर पैनल के काम करने के तरीके को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि फोटोवोल्टिक सेल गर्मी के बजाय प्रकाश से बिजली बनाते हैं। सूर्य की किरणों में अलग-अलग ऊर्जा और वेवलेंग्थ वाले फोटोन मौजूद होते हैं। जब ये फोटोन सोलर सेल के सेमीकंडक्टर पदार्थ से टकराते हैं, तो इलेक्ट्रॉनों की गति शुरू होती है और इससे विद्युत धारा पैदा होती है। इसलिए सीधे शब्दों में कहा जाए तो बिजली केवल तेज धूप से नहीं, बल्कि प्रकाश और फोटोवोल्टिक सेल के बीच होने वाली प्रतिक्रिया से बनती है।

बादलों के बीच क्यों जारी रहता है बिजली उत्पादन?
बादल सूर्य की रोशनी को पूरी तरह खत्म नहीं करते, बल्कि उसकी तीव्रता को कम कर देते हैं। वातावरण में मौजूद बिखरी हुई रोशनी भी सोलर पैनल तक पहुंचती रहती है। इसी वजह से बादल वाले दिन भी फोटोवोल्टिक सेल कुछ मात्रा में बिजली पैदा करते रहते हैं। हालांकि, रोशनी की तीव्रता कम होने पर पैनल की एफिशिएंसी और कुल आउटपुट में गिरावट आती है। आधुनिक तकनीक वाले कुछ मॉड्यूल कम रोशनी की परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं।
TOPCon तकनीक कम रोशनी में देती है बेहतर प्रदर्शन
TOPCon यानी Tunnel Oxide Passivated Contact तकनीक को आधुनिक सोलर मॉड्यूल की प्रमुख तकनीकों में गिना जाता है। यह तकनीक इलेक्ट्रॉनों की बेहतर आवाजाही में मदद करती है और ऊर्जा के नुकसान को कम करने पर काम करती है। यही कारण है कि TOPCon पैनल कम रोशनी में पारंपरिक PERC मॉड्यूल की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। इसकी अच्छी एफिशिएंसी, अपेक्षाकृत आसान निर्माण और बेहतर प्रदर्शन के कारण यह तकनीक तेजी से लोकप्रिय हुई है।
HJT पैनल भी कम रोशनी में रहते हैं प्रभावी
Heterojunction Technology यानी HJT भी कम रोशनी में बेहतर प्रदर्शन के लिए जानी जाती है। इस तकनीक वाले पैनलों में अलग-अलग सेमीकंडक्टर लेयर का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे उनकी ऊर्जा रूपांतरण क्षमता बढ़ सकती है। कई परिस्थितियों में HJT मॉड्यूल की एफिशिएंसी TOPCon से भी अधिक हो सकती है। हालांकि, इनके निर्माण की प्रक्रिया अपेक्षाकृत जटिल और महंगी होती है।

Bifacial पैनल दोनों तरफ से पकड़ते हैं रोशनी
Bifacial सोलर मॉड्यूल की खासियत यह है कि ये केवल सामने से आने वाली रोशनी पर निर्भर नहीं रहते। ये पीछे की तरफ से जमीन या आसपास की सतह से परावर्तित होने वाली रोशनी को भी बिजली में बदल सकते हैं। इनका प्रदर्शन जमीन की रिफ्लेक्टिविटी, पैनल की ऊंचाई और इंस्टॉलेशन डिजाइन पर निर्भर करता है। यही वजह है कि सोलर फार्म, पानी के आसपास और खुले क्षेत्रों में इनका इस्तेमाल फायदेमंद हो सकता है।
ज्यादा तापमान भी सोलर पैनल के लिए चुनौती
तेज धूप हमेशा ज्यादा बिजली उत्पादन की गारंटी नहीं देती, क्योंकि पैनल का तापमान बढ़ने पर इसकी एफिशिएंसी प्रभावित हो सकती है। सामान्य परिस्थितियों में लगभग 25 डिग्री सेल्सियस तापमान के आसपास सोलर मॉड्यूल बेहतर प्रदर्शन करते हैं। तापमान बढ़ने के साथ आउटपुट में कमी आने लगती है। गर्मियों में पैनल की सतह का तापमान काफी ज्यादा पहुंच सकता है, जिससे बिजली उत्पादन प्रभावित होता है। लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी रहने पर मॉड्यूल के मैटेरियल पर भी असर पड़ सकता है और उसकी उम्र कम होने की संभावना रहती है।
मानसून में सोलर पैनल से कितनी उम्मीद रखें?
मानसून के दौरान बादल और बारिश होने से सोलर पैनल का उत्पादन कम जरूर हो सकता है, लेकिन बिजली बनना पूरी तरह बंद नहीं होता। ऐसे समय में TOPCon, HJT और Bifacial जैसी आधुनिक तकनीक वाले मॉड्यूल बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। हालांकि वास्तविक उत्पादन मौसम, पैनल की दिशा, धूल, छाया, तापमान और स्थानीय रोशनी की स्थिति पर निर्भर करता है।
Read More : Rahul Gandhi Posters : प्रयागराज में राहुल गांधी के विरोध में पोस्टर, लिखा- ‘प्रयागराज WOW, झारखंड छी’











