Somnath Temple Controversy
Somnath Temple Controversy: गुजरात के तट पर स्थित प्रथम ज्योतिर्लिंग भगवान सोमनाथ का मंदिर वर्तमान में अपने विध्वंस से लेकर पुनरुत्थान तक के 1000 वर्षों की यात्रा का उत्सव मना रहा है। आस्था के इस महाकुंभ के बीच, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने मंदिर के पुनर्निर्माण के इतिहास को लेकर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू पर तीखा हमला बोला है। बीजेपी ने आरोप लगाया कि नेहरू सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के पक्ष में नहीं थे और उन्होंने राष्ट्रीय गौरव से जुड़े इस विषय पर पाकिस्तान को खुश रखने की नीति अपनाई। यह राजनीतिक विवाद अब नेहरू द्वारा लिखे गए उन पत्रों के इर्द-गिर्द घूम रहा है, जिन्हें बीजेपी ने उनके ‘हिंदू विरोधी’ होने का प्रमाण बताया है।
बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने सोशल मीडिया पर दस्तावेजों की एक श्रृंखला साझा करते हुए पंडित नेहरू की मंशा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अतीत में सोमनाथ को गजनवी और खिलजी जैसे आक्रांताओं ने लूटा था, लेकिन स्वतंत्र भारत में नेहरू ने भगवान सोमनाथ के प्रति उपेक्षा और घृणा का भाव दिखाया। त्रिवेदी ने 21 अप्रैल 1951 के एक पत्र का हवाला दिया, जो नेहरू ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को लिखा था। बीजेपी का दावा है कि इस पत्र में नेहरू ने सोमनाथ के द्वारों की ऐतिहासिक सच्चाई को ‘झूठा’ बताया और पाकिस्तान के सामने एक प्रकार का ‘सांस्कृतिक आत्मसमर्पण’ कर दिया।
बीजेपी ने दस्तावेजों के माध्यम से यह भी आरोप लगाया कि नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और अन्य मंत्रियों को सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल न होने की कड़ी चेतावनी दी थी। त्रिवेदी के अनुसार, नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्रों में शिकायत की थी कि मंदिर का भव्य निर्माण विदेशों में भारत की ‘धर्मनिरपेक्ष छवि’ को नुकसान पहुँचा रहा है। इतना ही नहीं, भारतीय दूतावासों को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि वे सोमनाथ ट्रस्ट को किसी भी प्रकार की सहायता प्रदान न करें। बीजेपी ने सवाल पूछा कि क्या यह मुगल आक्रमणकारियों के महिमामंडन और अंध तुष्टीकरण की पराकाष्ठा नहीं थी?
विवाद का एक और बड़ा पहलू सूचना एवं प्रसारण मंत्री आर.आर. दिवाकर को 28 अप्रैल 1951 को लिखा गया पत्र है। बीजेपी का कहना है कि इस पत्र में नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के अभिषेक समारोह की मीडिया कवरेज को कम करने का आदेश दिया था। उन्होंने इस पवित्र समारोह को ‘आडंबरपूर्ण’ करार दिया और लिखा कि यह आयोजन उन्हें काफी ‘चिंतित’ करता है। नेहरू इस बात से भी नाराज थे कि देश के राष्ट्रपति इस कार्यक्रम की शोभा बढ़ा रहे हैं। बीजेपी ने इसे भारतीय संस्कृति और आस्था के दमन की कोशिश बताया है।
13 जून 1951 को तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन को लिखे पत्र में भी नेहरू के विचार इसी दिशा में दिखे। बीजेपी के अनुसार, नेहरू ने मंदिर के उद्घाटन को ‘अनावश्यक शोर-शराबा’ कहकर खारिज कर दिया था। उन्होंने स्वीकार किया था कि उन्होंने अपने कैबिनेट मंत्रियों को इस धार्मिक उत्सव से जुड़ने से रोकने के लिए पूरा जोर लगाया था। बीजेपी का तर्क है कि जिस मंदिर को सरदार पटेल और कन्हैयालाल मुंशी ने राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बनाया, नेहरू ने उसे केवल एक मजहबी मुद्दा मानकर दबाने का प्रयास किया।
Read More : Turkman Gate Violence: तुर्कमान गेट हिंसा, 30 उपद्रवियों की पहचान, सांसद नदवी की भूमिका संदिग्ध
Middle East Crisis: मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ईरान संकट ने…
MI vs KKR : इंडियन प्रीमियर लीग 2026 के रोमांचक मुकाबले में मुंबई इंडियंस (MI)…
Pratapgarh Press Club : उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में पत्रकारिता के क्षेत्र की अग्रणी…
Rajasthan Crime : राजस्थान के झुंझुनूं जिले से एक रूह कंपा देने वाली वारदात सामने…
IPL 2026: आईपीएल की तीन बार की विजेता कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) पिछले कुछ समय…
Tamil Nadu Election 2026 : तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के लिए सियासी पारा अपने चरम…
This website uses cookies.