Iran Energy War
Iran Energy War : अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध विराम के बीच वैश्विक व्यापार जगत से एक चिंताजनक खबर सामने आई है। रूस की सरकारी समाचार एजेंसी ‘तास’ (TASS) के अनुसार, ईरान ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ से गुजरने वाले जहाजों की संख्या को सीमित करने का निर्णय लिया है। नई रिपोर्ट के मुताबिक, अब इस समुद्री रास्ते से एक दिन में केवल 15 जहाजों को ही गुजरने की अनुमति दी जाएगी। ईरान के इस कड़े रुख ने अंतरराष्ट्रीय ट्रांसपोर्टरों और तेल आयात करने वाले देशों की नींद उड़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि जहाजों की संख्या में इस भारी कटौती से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हो सकती है, जिसका सीधा असर कच्चे तेल और गैस की कीमतों पर पड़ेगा।
ईरान द्वारा जहाजों की आवाजाही सीमित करने का सबसे ज्यादा असर भारत जैसे देशों पर पड़ सकता है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर खाड़ी देशों पर निर्भर हैं। भारत के लिए एलपीजी (LPG), कच्चे तेल (Crude Oil) और महत्वपूर्ण रसायनों की सप्लाई इसी रास्ते से होती है। यदि हॉर्मुज से जहाजों का आवागमन बाधित होता है, तो भारत में ईंधन की कमी और महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है। हालांकि, पेट्रोलियम मंत्रालय स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है और वैकल्पिक रास्तों व रणनीतियों पर विचार कर रहा है ताकि देश की ऊर्जा सुरक्षा से कोई समझौता न हो।
देश में गैस संकट की आशंकाओं के बीच पेट्रोलियम मंत्रालय ने जनता को आश्वस्त किया है। मंत्रालय के अनुसार, सरकार एलपीजी संकट से निपटने के लिए हर संभव कदम उठा रही है। वर्तमान में देश के भीतर घरेलू एलपीजी सिलेंडरों का वितरण सुचारू रूप से चल रहा है और प्रतिदिन 58 लाख से अधिक सिलेंडरों की आपूर्ति की जा रही है। इसके अतिरिक्त, कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की उपलब्धता को भी बढ़ाकर 70 प्रतिशत तक कर दिया गया है। आंकड़ों के मुताबिक, एक ही दिन में लगभग 6,700 टन कमर्शियल एलपीजी की बिक्री दर्ज की गई, जो करीब 3.5 लाख सिलेंडरों के बराबर है। सरकार 5 किलो वाले छोटे सिलेंडरों की बिक्री पर भी जोर दे रही है ताकि छोटे उपभोक्ताओं को राहत मिल सके।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज की भौगोलिक और आर्थिक अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे दुनिया की ‘आर्थिक नस’ कहा जाता है। ईरान और ओमान के बीच स्थित यह जलडमरूमध्य केवल 34 किलोमीटर चौड़ा है, लेकिन यह खाड़ी के देशों को हिंद महासागर से जोड़ने वाला एकमात्र प्रवेश द्वार है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा यानी हर पांचवां बैरल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। तेल के अलावा, उर्वरक, रसायनों और कृषि उत्पादों के परिवहन के लिए भी यह मार्ग अनिवार्य है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में जरा सी भी हलचल पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाने की ताकत रखती है।
ईरान का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया पहले से ही भू-राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रही है। जहाजों की आवाजाही पर पाबंदी न केवल व्यापारिक हितों को चोट पहुँचाएगी, बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्ध विराम की स्थिरता पर भी सवाल खड़े करेगी। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह अपनी ऊर्जा कूटनीति को और अधिक विविध बनाने का संकेत है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ईरान पर इस पाबंदी को हटाने के लिए क्या दबाव बनाता है और भारत अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए कौन से नए विकल्प तलाशता है।
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