Strait of Hormuz Crisis
Strait of Hormuz Crisis: मध्य पूर्व में ईरान के साथ जारी सैन्य और कूटनीतिक गतिरोध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ के लगभग बंद होने से दुनिया भर में कच्चे तेल की आपूर्ति शृंखला पूरी तरह चरमरा गई है। इसके परिणामस्वरूप, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 112 डॉलर प्रति बैरल के खतरनाक स्तर पर पहुँच गई हैं। अमेरिका जैसे विकसित देशों में गैसोलीन की कीमत 5 डॉलर प्रति गैलन को पार कर गई है। परिवहन लागत में अचानक हुई इस वृद्धि ने खाद्य वस्तुओं सहित रोजमर्रा की हर चीज को महंगा कर दिया है, जिससे अब दुनिया के सामने एक गंभीर खाद्य सुरक्षा संकट मंडराने लगा है।
तेल संकट का सबसे गहरा असर विमानन और परिवहन क्षेत्र पर देखने को मिल रहा है। दुनिया भर की एयरलाइंस अपनी उड़ानों में भारी कटौती कर रही हैं। अकेले यूनाइटेड एयरलाइंस ने इस सप्ताह अपनी उड़ानों में 5 प्रतिशत की कमी की है, और अन्य बड़ी कंपनियां भी इसी रास्ते पर हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने ईंधन की राशनिंग (Rationing) शुरू कर दी है। दक्षिण पूर्व एशिया के देशों जैसे बांग्लादेश, फिलीपींस और श्रीलंका में पेट्रोल पंपों पर किलोमीटर लंबी कतारें देखी जा रही हैं। भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि देश की कुल तेल आपूर्ति का 80 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से होकर आता है।
बढ़ते दबाव के बीच अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने ‘Sheltering from Oil Shocks’ नामक एक विशेष 10-सूत्री कार्ययोजना जारी की है। यह योजना पूरी तरह से ईंधन की मांग घटाने पर केंद्रित है। इसमें शामिल सुझावों ने एक बार फिर कोविड-19 के दौर की यादें ताजा कर दी हैं। आईईए ने वाहनों के लिए लाइसेंस प्लेट (Odd-Even) आधारित दिन निर्धारित करने, हाईवे पर गति सीमा घटाने, हवाई यात्राओं में भारी कटौती करने, ‘वर्क फ्रॉम होम’ को अनिवार्य बनाने और रसोई में इलेक्ट्रिक चूल्हों के उपयोग जैसे कड़े कदम उठाने की वकालत की है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन रणनीतियों का प्रभाव किसी वैश्विक लॉकडाउन से कम नहीं होगा।
ऊर्जा संकट के नाम पर सरकारों द्वारा उठाए जा रहे कदम अब आम जनता की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करने लगे हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसी सरकारों ने पहले ही ‘गैर-जरूरी’ यात्राओं पर रोक लगानी शुरू कर दी है, जो सीधे तौर पर महामारी के दौरान इस्तेमाल की गई भाषा और नियमों से मेल खाती है। यदि यह संकट लंबा खिंचता है, तो आने वाले समय में ‘डिजिटल परमिट सिस्टम’ लागू किया जा सकता है, जिसके माध्यम से नागरिकों की यात्रा और उनके उपभोग की मात्रा को नियंत्रित किया जाएगा। हालांकि इसे ‘ऊर्जा सुरक्षा’ का नाम दिया जा रहा है, लेकिन मानवाधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि यह आमजन की आजादी पर एक बड़ा प्रहार हो सकता है।
वर्तमान भू-राजनीतिक अस्थिरता और होर्मुज जलडमरूमध्य की घेराबंदी ने भारत जैसे बड़े आयातक देशों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। घरेलू बाजार में महंगाई को नियंत्रित करने और भविष्य के झटकों से बचने के लिए भारत को अब पारंपरिक ईंधन पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे वैकल्पिक स्रोतों की ओर संक्रमण की गति को तेज करना अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता बन गया है। भारत को अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को मजबूत करने के साथ-साथ ऊर्जा संरक्षण के प्रति भी जनता को जागरूक करना होगा।
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