Supreme Court
भारत की न्यायिक व्यवस्था में एक ऐतिहासिक मोड़ आ सकता है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) की व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने की एक चौंकाने वाली मांग की है। सरकार का तर्क है कि जिस नेक उद्देश्य के साथ पीआईएल की शुरुआत की गई थी, वह अब भटक चुका है और इसका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है। केंद्र की इस दलील ने कानूनी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है, क्योंकि दशकों से पीआईएल को आम आदमी के अधिकारों की रक्षा का सबसे बड़ा हथियार माना जाता रहा है।
इस संवेदनशील मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की विशाल संवैधानिक बेंच कर रही है। केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने कहा कि पिछले 50 वर्षों में पीआईएल ने अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त कर लिया है। बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एमएम सुंदरेश सहित कई वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल हैं। सरकार ने स्पष्ट किया कि अब देश की न्याय प्रणाली इतनी सरल और पारदर्शी हो चुकी है कि पीआईएल जैसी विशेष व्यवस्था को या तो पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए या फिर इसे नए सिरे से पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है।
तुषार मेहता ने अपनी दलीलों में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DALSA) की सक्रियता का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आज ये संस्थान जरूरतमंदों को मुफ्त कानूनी सलाह और सहायता प्रदान कर रहे हैं। इसके अलावा, ई-फाइलिंग सिस्टम और अदालतों के आधुनिकीकरण ने न्याय तक पहुंच को बहुत सुलभ बना दिया है। अब कोई भी व्यक्ति साधारण पत्र लिखकर भी अदालत का ध्यान आकर्षित कर सकता है। ऐसी स्थिति में पीआईएल का मूल उद्देश्य, जो कि अशिक्षित और अक्षम लोगों की मदद करना था, अब अन्य संस्थागत माध्यमों से पूरा हो रहा है।
सरकार ने सबसे बड़ा हमला पीआईएल के दुरुपयोग पर किया। तुषार मेहता ने कहा कि आजकल ज्यादातर जनहित याचिकाएं ‘प्रेरित’ या ‘प्रायोजित’ होती हैं। इसका अर्थ है कि याचिका दायर कोई और करता है, लेकिन उसके पीछे के वास्तविक इरादे और हित कुछ और ही होते हैं। जो व्यवस्था गरीबों, विकलांगों और सामाजिक रूप से बहिष्कृत लोगों के लिए बनी थी, उसे अब व्यक्तिगत हितों या राजनीतिक एजेंडे को साधने के लिए हथियार बनाया जा रहा है। सरकार के अनुसार, देश की बदली हुई परिस्थितियों में अब पुरानी व्यवस्था को ढोते रहना उचित नहीं है।
सॉलिसिटर जनरल की दलीलों पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने सहमति जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट अब पीआईएल को लेकर बहुत सतर्क हो गया है। अब किसी भी याचिका को स्वीकार करने से पहले उसके आधार और नीयत की बारीकी से जांच की जाती है। केवल उन्हीं मामलों में नोटिस जारी किए जाते हैं जिनमें कोई ठोस आधार होता है। CJI ने यह भी माना कि 2006 से 2026 के इन 20 वर्षों में तकनीक और न्याय तक पहुंच के मामले में बड़े बदलाव आए हैं। उन्होंने भविष्य की ओर संकेत देते हुए कहा कि संभव है कि आने वाले समय में जनहित याचिका की आवश्यकता ही न रहे।
यदि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार की इस मांग को स्वीकार कर लेता है, तो यह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव होगा। पीआईएल ने अतीत में बंधुआ मजदूरी, पर्यावरण संरक्षण और मानवाधिकारों के क्षेत्र में क्रांतिकारी काम किए हैं। हालांकि, इसके दुरुपयोग को रोकना भी एक बड़ी चुनौती है। अब सबकी नजरें 9 जजों की इस बेंच के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि ‘जनहित’ की रक्षा के लिए भविष्य में कौन सा रास्ता अपनाया जाएगा। क्या पीआईएल का अंत होगा या यह नए रूप में सामने आएगी, यह समय ही बताएगा।
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