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Supreme Court Big Verdict: धर्मांतरण के बाद नहीं मिलेगा अनुसूचित जाति का दर्जा, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला; जानें किसे होगा नुकसान

Supreme Court Big Verdict: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि संविधान के तहत ‘अनुसूचित जाति’ (SC) का दर्जा केवल उन व्यक्तियों तक सीमित है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानते हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि यदि कोई व्यक्ति इन धर्मों को छोड़कर ईसाई या किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण (Conversion) करता है, तो वह स्वतः ही अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित विशेष संवैधानिक दर्जा और उससे जुड़ी सुरक्षा खो देगा। यह फैसला भविष्य में आरक्षण और जातिगत संरक्षण से जुड़े कई विवादों के लिए एक नजीर साबित होगा।

जस्टिस मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच का आदेश: SC-ST एक्ट के लाभ पर रोक

इस संवेदनशील मामले की सुनवाई जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने की। बेंच ने कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि ईसाई धर्म अपनाने वाला कोई भी दलित व्यक्ति अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत मिलने वाले विशेष लाभों या सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता है। अदालत का तर्क है कि एक बार जब कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह उस सामाजिक संरचना से बाहर हो जाता है जिसके आधार पर उसे ‘अनुसूचित जाति’ की श्रेणी में रखा गया था। ऐसे में उसे सामान्य नागरिक के रूप में देखा जाएगा, न कि एससी वर्ग के सदस्य के रूप में।

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय मई 2025 में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए एक फैसले के खिलाफ दायर अपील पर आया है। हाईकोर्ट ने भी अपने आदेश में यही कहा था कि धर्मांतरण के बाद व्यक्ति अपनी पुरानी जातिगत पहचान के आधार पर कानूनी लाभ नहीं ले सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सही ठहराते हुए हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। इस कानूनी लड़ाई की जड़ें एक व्यक्तिगत विवाद से जुड़ी थीं, जिसने अब एक बड़े राष्ट्रीय कानूनी सिद्धांत का रूप ले लिया है।

मामले की पृष्ठभूमि: पादरी चिंथदा आनंद की याचिका और विवाद

यह पूरा विवाद चिंथदा आनंद नामक व्यक्ति से शुरू हुआ, जो जन्म से दलित थे लेकिन बाद में उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया और पादरी बन गए। आनंद ने अक्काला रामिरेड्डी और कुछ अन्य लोगों के खिलाफ जातिगत भेदभाव और दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया था। उन्होंने अपनी शिकायत में SC-ST एक्ट की धाराओं का उपयोग किया था। हालांकि, जब मामला अदालत पहुंचा, तो प्रतिवादी पक्ष ने तर्क दिया कि चूंकि आनंद अब एक ईसाई पादरी हैं, इसलिए वे अनुसूचित जाति के सदस्य नहीं रहे और उन पर SC-ST एक्ट लागू नहीं होता।

कानूनी संघर्ष: हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर

चिंथदा आनंद ने जब अपनी शिकायत दर्ज कराई, तो मामला पहले निचली अदालत और फिर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट पहुँचा। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका पर यह कहते हुए सुनवाई से इनकार कर दिया कि वे अब संवैधानिक रूप से एससी वर्ग का हिस्सा नहीं हैं। इसके बाद आनंद ने न्याय की गुहार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने भी सभी संवैधानिक प्रावधानों और पूर्व के फैसलों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद आनंद की याचिका को खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन के साथ ही जातिगत संरक्षण समाप्त हो जाता है।

धर्मांतरण और सामाजिक सुरक्षा पर व्यापक प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो जातिगत लाभ और धार्मिक स्वतंत्रता दोनों का एक साथ लाभ उठाना चाहते हैं। भारत का संविधान राष्ट्रपति के आदेश (1950) के माध्यम से यह स्पष्ट करता है कि केवल हिंदू (और बाद में जोड़े गए सिख और बौद्ध) ही एससी श्रेणी में आ सकते हैं। इस्लाम और ईसाई धर्म को मानने वालों को इस श्रेणी से बाहर रखा गया है क्योंकि इन धर्मों के सिद्धांतों में जाति प्रथा का अस्तित्व नहीं माना जाता।

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