Surajpur Child Labor : छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो सभ्य समाज और सरकारी दावों को आईना दिखाने के लिए काफी है। जिले के विभिन्न क्षेत्रों में अवैध रूप से संचालित ईंट भट्ठों में छोटे-छोटे मासूमों से कड़ी मजदूरी कराई जा रही है। सबसे चौंकाने वाली और विचलित करने वाली बात यह है कि काम कर रहे कई बच्चे स्कूल ड्रेस में नजर आ रहे हैं। यह स्थिति स्पष्ट रूप से संकेत देती है कि जिन हाथों में कलम और किताबें होनी चाहिए थी, उन हाथों में ईंटें थमा दी गई हैं। शिक्षा के अधिकार और सुरक्षित बचपन के दावों को धता बताते हुए यह अवैध कारोबार खुलेआम फल-फूल रहा है, जिससे स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लग गए हैं।

ओडगी ब्लॉक में मासूमों का शोषण: 300 रुपये के लिए ढो रहे ईंटें
बाल श्रम का यह काला खेल जिले के ओडगी ब्लॉक अंतर्गत कुप्पी गांव के गंगापुर इलाके में बड़े पैमाने पर चल रहा है। यहां सुबह से शाम तक बच्चों से ईंट ढुलाई जैसे जोखिम भरे और कठिन शारीरिक कार्य कराए जा रहे हैं। जानकारी के अनुसार, इन बच्चों को पूरे दिन की कड़ी मेहनत के बदले मात्र 300 से 400 रुपये की दिहाड़ी दी जा रही है। चंद रुपयों के लालच में भट्ठा संचालक इन बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। भारी वजन उठाने के कारण इन मासूमों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है, लेकिन मुनाफे की अंधी दौड़ में उनकी जान और अधिकारों की किसी को परवाह नहीं है।
प्रशासनिक मौन पर उठे सवाल: क्या अधिकारियों की है मिलीभगत?
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल सरकारी तंत्र और जिम्मेदार विभागों की भूमिका को लेकर है। इतने बड़े स्तर पर बाल श्रम और अवैध ईंट भट्ठों का संचालन होने के बावजूद श्रम विभाग, राजस्व विभाग और खनिज विभाग की चुप्पी कई संदेह पैदा करती है। नियमानुसार, बाल श्रम कानूनों के उल्लंघन पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है, फिर भी अब तक इन भट्ठों पर कोई छापा क्यों नहीं मारा गया? क्या जिम्मेदार अधिकारियों को इस जमीनी हकीकत की जानकारी नहीं है, या फिर जानबूझकर प्रभावशाली भट्ठा संचालकों को संरक्षण दिया जा रहा है? यह अनदेखी न केवल प्रशासनिक लापरवाही है, बल्कि एक गंभीर अपराध की श्रेणी में आती है।
अधिकारियों ने साधी चुप्पी: जवाब देने से बच रहा सिस्टम
जब इस गंभीर मामले को लेकर संबंधित विभागों के अधिकारियों से उनकी प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, तो सिस्टम की संवेदनहीनता और भी साफ नजर आई। अधिकतर अधिकारियों ने इस विषय पर कुछ भी कहने से परहेज किया या मामले को टालते नजर आए। प्रशासनिक अधिकारियों की यह चुप्पी उन माफियाओं के हौसले बुलंद कर रही है जो मासूमों के श्रम को अपनी कमाई का जरिया बना चुके हैं। जब रक्षक ही मौन हो जाएं, तो इन बेसहारा बच्चों के अधिकारों की रक्षा कौन करेगा, यह एक यक्ष प्रश्न बना हुआ है।
सख्त कार्रवाई और बचपन बचाने की तत्काल आवश्यकता
सूरजपुर की यह घटना केवल एक जिले की समस्या नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता की कहानी है। स्कूल ड्रेस में ईंट ढोते बच्चे “पढ़ेगा इंडिया, तो बढ़ेगा इंडिया” जैसे नारों का मजाक उड़ा रहे हैं। अब समय आ गया है कि जिला प्रशासन इस मामले को सर्वोच्च प्राथमिकता पर ले और अवैध भट्ठों को बंद कराने के साथ-साथ दोषियों पर एफआईआर दर्ज करे। बच्चों को काम से मुक्त कराकर उन्हें दोबारा स्कूल की दहलीज तक पहुँचाना अनिवार्य है। यदि अब भी प्रशासन नहीं जागा, तो आने वाली पीढ़ी का भविष्य इन ईंट भट्ठों की आग में जलकर राख हो जाएगा।


















