Surajpur School Controversy
Surajpur School Controversy: छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से शिक्षा व्यवस्था को झकझोर देने वाली एक बेहद परेशान करने वाली घटना सामने आई है। यहाँ के डीएवी मुख्यमंत्री पब्लिक स्कूल में शिक्षा का अधिकार (RTE) श्रेणी के तहत पढ़ने वाले छात्रों के साथ दुर्व्यवहार और उनसे मजदूरी कराने के गंभीर आरोप लगे हैं। परिजनों का दावा है कि जिन बच्चों के हाथों में भविष्य संवारने वाली किताबें होनी चाहिए थीं, स्कूल प्रबंधन ने उनके हाथों में फावड़े और सीमेंट थमा दिया। इस घटना ने न केवल अभिभावकों को आक्रोशित कर दिया है, बल्कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।
कलेक्टर जनदर्शन और श्रम विभाग को सौंपे गए शिकायत पत्र में अभिभावकों ने रोंगटे खड़े कर देने वाले खुलासे किए हैं। आरोप है कि कक्षा 9वीं से 12वीं तक के आरटीई छात्रों से स्कूल परिसर के भीतर चल रहे निर्माण कार्यों में श्रम कराया गया। इन बच्चों से सीमेंट का मिश्रण तैयार करवाना, गहरे गड्ढे खुदवाना और दीवारों की पुताई जैसे कठिन काम लिए गए। स्थिति इतनी गंभीर थी कि लगातार शारीरिक श्रम करने के कारण कई मासूम बच्चों के हाथों में छाले पड़ गए। परिजनों का कहना है कि पढ़ाई के समय में इस तरह का काम कराना बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि स्कूल प्रबंधन बच्चों पर दबाव बनाने के लिए अनैतिक तरीकों का इस्तेमाल करता था। छात्रों ने कथित तौर पर बताया कि काम करने से इनकार करने पर उन्हें ‘आंतरिक अंकों’ (Internal Marks) में कटौती करने या स्कूल से निष्कासित करने की धमकी दी जाती थी। सबसे दुखद पहलू यह है कि बच्चों को उनकी आर्थिक पृष्ठभूमि को लेकर ताने दिए जाते थे। छात्रों का आरोप है कि उन्हें यह कहकर प्रताड़ित किया गया कि वे “आरटीई के बच्चे” हैं, इसलिए उन्हें स्कूल में काम करना ही पड़ेगा। इस भेदभावपूर्ण व्यवहार ने बच्चों के आत्मविश्वास को गहरी चोट पहुँचाई है।
स्कूल प्रबंधन के इस कथित तानाशाही रवैये और लगातार हो रहे अपमान के कारण कई परिवारों ने एक कठोर निर्णय लिया है। परिजनों का आरोप है कि डर और अपमान के माहौल में बच्चों का पढ़ना नामुमकिन हो गया था, जिसके चलते कुछ अभिभावकों ने अपने बच्चों का नाम स्कूल से कटवा लिया है। एक पीड़ित छात्र के पिता ने आपबीती सुनाते हुए कहा कि जब उनका बेटा घर लौटा, तो उसके हाथों के छालों ने पूरी कहानी बयां कर दी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सरकारी योजनाओं के तहत पढ़ने वाले गरीब बच्चों के साथ इस तरह का अमानवीय व्यवहार स्वीकार्य है?
मामले के तूल पकड़ने और वीडियो वायरल होने के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया है। जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) अजय मिश्रा ने पुष्टि की है कि उन्हें स्कूल के विरुद्ध औपचारिक शिकायत प्राप्त हुई है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए विभाग ने तत्काल एक तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन कर दिया है। शिक्षा अधिकारी ने आश्वासन दिया है कि समिति सभी बिंदुओं की सूक्ष्मता से जांच करेगी और बच्चों व उनके परिजनों के बयान दर्ज किए जाएंगे। यदि स्कूल प्रबंधन पर लगे आरोप सही पाए जाते हैं, तो नियमों के तहत कड़ी दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
यह घटना केवल एक स्कूल की लापरवाही नहीं है, बल्कि यह बाल अधिकारों के उल्लंघन का एक गंभीर मामला है। आरटीई कानून का उद्देश्य समाज के वंचित वर्ग को सम्मानजनक शिक्षा देना है, न कि उन्हें ‘सस्ता मजदूर’ समझकर अपमानित करना। सूरजपुर की इस घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि स्कूलों में निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में किसी भी छात्र को शिक्षा के मंदिर में इस तरह के शोषण का सामना न करना पड़े।
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