Bansu Lohar Case : छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिला प्रशासन ने शासकीय कार्यों में गंभीर अनियमितता, पद के दुरुपयोग और भू-माफियाओं के साथ मिलीभगत के मामले में एक बड़ी दंडात्मक कार्रवाई की है। जिला प्रशासन द्वारा सहायक ग्रेड-02 अजय कुमार तिवारी के विरुद्ध ‘दीर्घ शास्ति’ (बड़ी सजा) अधिरोपित की गई है। यह पूरा मामला सरगुजा जिले के सबसे चर्चित ‘बंसू लोहार प्रकरण’ से जुड़ा हुआ है। उल्लेखनीय है कि इस जमीन घोटाले ने पूरे प्रदेश में सुर्खियां बटोरी थीं, जिसके बाद तत्कालीन कलेक्टर विलास भोसकर ने भू-माफियाओं और इसमें संलिप्त कर्मचारियों के विरुद्ध व्यापक स्तर पर अभियान चलाकर कार्रवाई की थी। अजय तिवारी पर हुई यह कार्रवाई भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रशासन के सख्त रुख को स्पष्ट करती है।
जांच में सामने आया है कि अजय कुमार तिवारी, जिला कार्यालय की नजूल शाखा में पदस्थ रहते हुए गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक अपराधों में शामिल थे। उन्होंने ग्राम नमनाकला (तहसील अंबिकापुर) राजमोहिनी भवन के पीछे स्थित खसरा क्रमांक 243/1 की लगभग 1.710 हेक्टेयर बेशकीमती शासकीय भूमि के नामांतरण में निर्धारित राजस्व नियमों को दरकिनार कर दिया था। आरोप है कि तिवारी ने विधि विरुद्ध तरीके से भू-माफियाओं को लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से इस सरकारी जमीन का नामांतरण किया। इस धोखाधड़ी के उजागर होने के बाद, देहात थाना गांधीनगर में 11 मार्च 2024 को उनके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420, 467, 468, 471 और 120-बी (साजिश रचना) के तहत गंभीर आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे।
जमीन घोटाले के अलावा, अजय तिवारी पर अनुशासनहीनता के भी आरोप प्रमाणित हुए हैं। अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) धौरपुर की रिपोर्ट के अनुसार, 12 मार्च 2024 से तिवारी बिना किसी पूर्व सूचना या अनुमति के अपने कर्तव्य से लगातार अनुपस्थित रहे। कानूनी कार्रवाई की भनक लगते ही ड्यूटी से गायब होना उनकी संलिप्तता की ओर इशारा कर रहा था। इस कृत्य के लिए उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया था और उनका मुख्यालय तहसील कार्यालय उदयपुर नियत किया गया था। ड्यूटी से इस तरह की फरारी को प्रशासन ने सेवा नियमों का घोर उल्लंघन माना है।
निलंबन की अवधि के दौरान अजय तिवारी के विरुद्ध विस्तृत विभागीय जांच संस्थित की गई थी। जांच अधिकारी द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन में तिवारी पर लगाए गए सभी आरोप अक्षरसः प्रमाणित पाए गए। प्रतिवेदन में स्पष्ट किया गया कि उनका आचरण ‘छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम 1965’ के नियम 03 और 07 के पूर्णतः विपरीत था। एक लोक सेवक होने के नाते जिस निष्ठा और ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है, तिवारी ने उसका पालन न कर पद की गरिमा को धूमिल किया। जांच की गहनता और साक्ष्यों के आधार पर प्रशासन ने उनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई का मन बनाया।
मामले की संवेदनशीलता और भ्रष्टाचार की गंभीरता को देखते हुए, जिला प्रशासन ने अजय कुमार तिवारी (निलंबित सहायक ग्रेड-02) पर ‘दीर्घ शास्ति’ अधिरोपित की है। आदेश के तहत उन्हें वर्तमान पद से ‘पदावनत’ (Demote) कर दिया गया है। इसके साथ ही, उन्हें वर्तमान में प्राप्त हो रहे वेतन मैट्रिक्स के न्यूनतम लेवल पर लाने का निर्णय लिया गया है। यह सजा न केवल उनके करियर के लिए एक बड़ा झटका है, बल्कि यह विभाग के अन्य कर्मचारियों के लिए भी एक चेतावनी है कि शासकीय संपत्तियों के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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