China Annihilation Threat
China Annihilation Threat: ताइवान और चीन के बीच दशकों से चला आ रहा भू-राजनीतिक विवाद अब एक ऐसे मोड़ पर आ गया है जहाँ से वापसी का रास्ता खतरनाक नजर आ रहा है। अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए ताइवान ने अमेरिका से प्राप्त अत्याधुनिक और घातक मिसाइल प्रणालियों को तैनात करने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। इस कदम ने बीजिंग को इस कदर आक्रोशित कर दिया है कि उसने ताइवान को सीधे तौर पर ‘सर्वनाश’ और ‘पूर्ण विनाश’ की चेतावनी दे डाली है। यह सैन्य विस्तार न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
चीनी सैन्य नेतृत्व ने ताइवान की इस सैन्य तैयारियों पर बेहद तल्ख प्रतिक्रिया दी है। चीनी सेना के आधिकारिक प्रवक्ता जियांग बिन ने एक कड़ा बयान जारी करते हुए कहा कि ताइवान द्वारा अमेरिकी हथियारों के दम पर चीन की मुख्य भूमि को चुनौती देना “आत्मघाती” कदम है। उन्होंने इसे “बेतुका और अति-आत्मविश्वास” करार देते हुए स्पष्ट किया कि चीन की सेना अपनी अखंडता के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। चीन ने दो टूक शब्दों में कहा है कि यदि अलगाववादी ताकतें अपनी हरकतों से बाज नहीं आईं, तो युद्ध की स्थिति में ताइवान का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
ताइवान अपनी रक्षा पंक्ति को अभेद्य बनाने के लिए अमेरिका के साथ 11.1 बिलियन डॉलर का एक विशाल सैन्य समझौता किया है। इस रक्षा सौदे के तहत ताइवान को 82 M142 HIMARS लॉन्चर और 420 ATACMS मिसाइलें प्राप्त हो रही हैं। इन मिसाइलों की मारक क्षमता लगभग 300 किलोमीटर तक है, जो सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। पेंघू और डोंगयिन जैसे रणनीतिक द्वीपों पर इनकी तैनाती होने से चीन के फुज्यान और झेजियांग प्रांतों में स्थित नौसैनिक ठिकाने और हवाई अड्डे सीधे ताइवान के निशाने पर आ जाएंगे।
लॉकहीड मार्टिन द्वारा विकसित HIMARS (High Mobility Artillery Rocket System) अपनी गतिशीलता और सटीकता के लिए विश्व विख्यात है। इसकी सबसे बड़ी खासियत “शूट-एंड-स्कूट” तकनीक है, जिसका अर्थ है कि मिसाइल दागने के तुरंत बाद लॉन्चर अपनी स्थिति बदल लेता है, जिससे दुश्मन के लिए जवाबी हमला करना लगभग असंभव हो जाता है। यूक्रेन युद्ध में रूस के खिलाफ इस सिस्टम ने अपनी सफलता साबित की है। मात्र 3 क्रू सदस्यों द्वारा संचालित यह मोबाइल सिस्टम युद्ध के मैदान में ताइवान को “एसिमेट्रिक वारफेयर” (असमान युद्ध) में बढ़त दिलाने की क्षमता रखता है।
चीन और ताइवान के बीच यह तनाव 1949 के गृहयुद्ध की विरासत है। जहाँ चीन “वन चाइना पॉलिसी” के तहत ताइवान को अपना एक विद्रोही प्रांत मानता है, वहीं ताइवान खुद को एक जीवंत लोकतंत्र और स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में देखता है। पिछले कुछ महीनों में चीन के लड़ाकू विमानों ने रिकॉर्ड संख्या में ताइवान के वायु रक्षा क्षेत्र (ADIZ) का उल्लंघन किया है। अमेरिका, जो ताइवान का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता है, इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है, जिसे चीन अपने आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप और उकसावे की कार्रवाई मान रहा है।
ताइवान जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। यहाँ किसी भी प्रकार का सैन्य संघर्ष वैश्विक सप्लाई चेन, विशेषकर सेमीकंडक्टर उद्योग को तहस-नहस कर सकता है। जैसे-जैसे ताइवान अपनी मिसाइल बैटरी तैनात कर रहा है और चीन अपनी युद्धक तैयारियों को धार दे रहा है, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताएं बढ़ती जा रही हैं। कूटनीतिक गलियारों में अब सवाल यह नहीं है कि “क्या युद्ध होगा?” बल्कि यह है कि “युद्ध कब शुरू होगा?”
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