Tamil Nadu Election 2026
Tamil Nadu Election 2026 : तमिलनाडु में आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राजनीतिक सरगर्मी चरम पर पहुँच गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) के बीच गठबंधन की सुगबुगाहट तो तेज है, लेकिन सीटों के बंटवारे और पुराने सहयोगियों की वापसी को लेकर दोनों दलों के बीच पेंच फंसता नजर आ रहा है। शुक्रवार को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नयनार नागेंद्रन और AIADMK महासचिव एडप्पाडी पलनीस्वामी के बीच हुई मुलाकात ने राज्य की भावी राजनीति के कई संकेत दिए हैं।
गठबंधन के भीतर सबसे बड़ा मुद्दा सीटों की संख्या को लेकर बना हुआ है। सूत्रों के अनुसार, दिल्ली में अमित शाह से हुई मुलाकात के बाद अब चेन्नई में बातचीत का दौर जारी है। भाजपा इस बार 50 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की जिद पर अड़ी है। हालांकि, AIADMK का गणित कुछ अलग ही है। पार्टी नेतृत्व ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह कुल 234 सीटों में से कम से कम 170 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारना चाहती है। इसका सीधा मतलब यह है कि वह भाजपा समेत गठबंधन के अन्य सभी छोटे दलों के लिए केवल 64 सीटें ही छोड़ना चाहती है।
भाजपा केवल सीटों की संख्या तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वह गठबंधन के कुनबे को बड़ा करने की रणनीति पर भी काम कर रही है। भाजपा चाहती है कि बागी नेता ओ. पन्नीरसेल्वम (OPS) और AMMK के प्रमुख टीटीवी दिनाकरण को भी इस गठबंधन का हिस्सा बनाया जाए ताकि विपक्षी वोटों के बिखराव को रोका जा सके। लेकिन पलनीस्वामी इस शर्त पर बिल्कुल सहमत नहीं दिख रहे हैं। बैठक में AIADMK की ओर से साफ कर दिया गया कि पन्नीरसेल्वम को वापस लेने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। रही बात दिनाकरण की, तो उस पर भविष्य में विचार करने की हल्की खिड़की जरूर खुली छोड़ी गई है।
सीटों की इस भारी-भरकम मांग के पीछे भाजपा की बढ़ती महत्वाकांक्षा है, लेकिन AIADMK 2021 के नतीजों को ढाल बना रही है। पिछले चुनावों में AIADMK ने भाजपा को 20 सीटें दी थीं, जिनमें से भाजपा केवल 4 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई थी। ऐसे में भाजपा द्वारा इस बार दोगुनी से भी अधिक सीटों की मांग करना पलनीस्वामी गुट को रास नहीं आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सीटों के इस अंतर को जल्द नहीं सुलझाया गया, तो गठबंधन की मजबूती पर सवालिया निशान खड़े हो सकते हैं।
सीटों के विवाद के बीच, दोनों दलों ने चुनावी रैलियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरों को लेकर भी चर्चा की। भाजपा और AIADMK दोनों ही जानते हैं कि पीएम मोदी की लोकप्रियता का फायदा गठबंधन को जमीनी स्तर पर मिल सकता है। बैठक में इस बात की रूपरेखा तैयार की गई कि प्रधानमंत्री के कार्यक्रम किन क्षेत्रों में रखे जाएं जहाँ गठबंधन की पकड़ कमजोर है। रणनीतिक रूप से उन जिलों की पहचान की जा रही है जहाँ मोदी की छवि और केंद्र की योजनाओं का प्रभाव मतदाताओं को रिझाने में कारगर साबित हो सकता है।
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और अमित शाह के साथ हुई पिछली मुलाकातों के बाद अब गेंद प्रदेश नेतृत्व के पाले में है। भाजपा के लिए तमिलनाडु की राह हमेशा कठिन रही है, लेकिन पार्टी इस बार अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। वहीं पलनीस्वामी के लिए यह चुनाव अपनी साख बचाने की लड़ाई है, क्योंकि उन्हें न केवल DMK का मुकाबला करना है बल्कि पार्टी के भीतर से उठने वाली चुनौतियों को भी शांत रखना है। आने वाले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि यह गठबंधन अपनी आंतरिक कलह को सुलझाकर चुनावी मैदान में कितनी मजबूती से उतरता है।
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