Shashi Tharoor: वरिष्ठ कांग्रेस सांसद डॉ. शशि थरूर ने भारतीय राजनीति में वंशवाद (Dynastic Politics) पर करारा प्रहार करते हुए कहा है कि “भारतीय राजनीति परिवारों की जायदाद नहीं है।” उनका कहना है कि वंशवादी राजनीति भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर खतरा बन चुकी है और अब समय आ गया है कि भारत योग्यता और क्षमता आधारित राजनीति को अपनाए।
थरूर का यह बयान ऐसे समय आया है जब उनकी पार्टी कांग्रेस लंबे समय से नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यह टिप्पणी प्रोजेक्ट सिंडिकेट नामक अंतरराष्ट्रीय मीडिया पोर्टल पर प्रकाशित उनके आलेख “Indian Politics Are a Family Business” में की गई, जिसने देश के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
थरूर ने अपने लेख में कहा कि भारत में राजनीतिक सत्ता का निर्धारण अक्सर योग्यता, प्रतिबद्धता या जमीनी जुड़ाव से नहीं, बल्कि वंश से होता है, जिससे शासन की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ता है। उन्होंने लिखा“जब सत्ता परिवार के उत्तराधिकार के आधार पर तय होती है, तो लोकतंत्र का असली अर्थ कमजोर पड़ जाता है।”थरूर ने जोर दिया कि भारत को अब यह मानना होगा कि नेतृत्व जन्मसिद्ध अधिकार नहीं, बल्कि योग्यता और मेहनत का परिणाम होना चाहिए।
थरूर के इस बयान ने सियासी बहस छेड़ दी है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस पर तुरंत प्रतिक्रिया दी और इसे कांग्रेस पर भीतर से की गई “चुभती हुई टिप्पणी” बताया।भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा –“डॉ. शशि थरूर अब ‘खतरों के खिलाड़ी’ बन गए हैं। उन्होंने भारत के असली ‘नेपो किड्स’ – राहुल गांधी और तेजस्वी यादव – को सीधी चुनौती दी है। देखते हैं, कांग्रेस का प्रथम परिवार अब उनके साथ क्या व्यवहार करता है।”पूनावाला ने कहा कि यह वही वजह है जिससे “कांग्रेस के नामदार नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे कामदार से नफरत करते हैं।”
थरूर के लेख को कांग्रेस नेतृत्व के लिए असहज माना जा रहा है। हालांकि, कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इसे “स्वतंत्र विचार” बताते हुए समर्थन भी किया।पार्टी सांसद उदित राज ने कहा—“भारत में हर सेक्टर में खानदानी सोच है – डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, बिजनेसमैन का बेटा बिजनेसमैन और पॉलिटिशियन का बेटा नेता बन जाता है। पॉलिटिक्स इससे अलग नहीं है। लेकिन इसका नुकसान यह है कि मौके सिर्फ परिवारों तक सीमित रह जाते हैं।”उन्होंने जोड़ा कि यह समस्या सिर्फ राजनीति में नहीं, बल्कि ब्यूरोक्रेसी, ज्यूडिशियरी और फिल्म इंडस्ट्री तक फैली हुई है।
थरूर ने अपने आलेख में बताया कि नेहरू-गांधी परिवार का भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में बड़ा योगदान रहा है, लेकिन समय के साथ राजनीति एक पारिवारिक व्यवसाय बन गई। उन्होंने देश के कई उदाहरण गिनाए—
ओडिशा: बीजू पटनायक के निधन के बाद उनके बेटे नवीन पटनायक ने पिता की राजनीतिक विरासत संभाली।
महाराष्ट्र: बाल ठाकरे से उद्धव ठाकरे और अब आदित्य ठाकरे तक नेतृत्व हस्तांतरित हुआ।
उत्तर प्रदेश: मुलायम सिंह यादव के बाद उनके बेटे अखिलेश यादव ने पार्टी की कमान संभाली।
बिहार: रामविलास पासवान के निधन के बाद उनके बेटे चिराग पासवान लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख बने।
पंजाब, तमिलनाडु और जम्मू-कश्मीर में भी यही परंपरा जारी है।
थरूर ने लिखा कि यह प्रवृत्ति केवल राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक देखने को मिलती है।
थरूर ने कहा कि यह समस्या भारत तक सीमित नहीं है।उन्होंने उदाहरण दिया कि—पाकिस्तान में भुट्टो और शरीफ परिवार,बांग्लादेश में शेख और जिया परिवार,श्रीलंका में भंडारनायके और राजपक्षे परिवारराजनीति पर दशकों से हावी रहे हैं।उन्होंने कहा“वंशवाद पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में गहराई से समाया हुआ है, लेकिन भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में यह और भी बेमेल लगता है।”
थरूर का कहना है कि परिवार आधारित राजनीति इसलिए फलती-फूलती है क्योंकि एक “फैमिली ब्रांड” मतदाताओं के बीच भरोसे का प्रतीक बन जाता है।“अगर मतदाता किसी नेता के पिता या भाई को जानते हैं, तो वे उसी परिवार के नए चेहरे को भी स्वीकार कर लेते हैं। उसे विश्वसनीयता बनाने की जरूरत नहीं पड़ती।”लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती है और योग्य लोगों के अवसर सीमित कर देती है।
डॉ. शशि थरूर का यह लेख न केवल कांग्रेस के भीतर असहजता पैदा कर रहा है, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र के लिए एक आत्ममंथन का संदेश है।भले ही भाजपा इसे कांग्रेस पर अंदरूनी हमला बताकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही हो, लेकिन थरूर ने जिस ‘वंशवाद बनाम योग्यता’ की बहस को उठाया है, वह भारतीय राजनीति की सबसे पुरानी और सबसे कठिन सच्चाई पर चोट करती है।
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