The Bengal Files: विवेक रंजन अग्निहोत्री की बहुप्रचारित फिल्म “The Bengal Files” बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पा रही है। लगभग ₹35 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने पहले वीकेंड में ₹7 करोड़ से भी कम की कमाई की है। वहीं, विवेक की ही पिछली फिल्म “The Kashmir Files” ने पहले वीकेंड में ही ₹20 करोड़ का आंकड़ा छू लिया था। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर “The Bengal Files” क्यों असफल होती दिख रही है?
फिल्म की रिलीज़ से पहले विवेक अग्निहोत्री ने “The Bengal Files” को लेकर सोशल मीडिया से लेकर न्यूज प्लेटफॉर्म्स पर जमकर प्रचार किया। डायरेक्ट एक्शन डे 1946, नौआखाली दंगे, और कोलकाता नरसंहार जैसे संवेदनशील विषयों को फिल्म का आधार बनाकर दर्शकों की संवेदनाओं को झकझोरने की कोशिश की गई। लेकिन इसके बावजूद दर्शकों में फिल्म को लेकर वांछित उत्साह नहीं दिखा।
विवेक अग्निहोत्री का आरोप है कि ममता बनर्जी सरकार ने फिल्म पर अघोषित बैन लगाया, जिससे राज्य के मल्टीप्लेक्स में इसे नहीं दिखाया गया। हालांकि, तथ्य यह है कि पश्चिम बंगाल में हिंदी फिल्मों का कलेक्शन आमतौर पर राष्ट्रीय औसत से कम होता है। हालिया ब्लॉकबस्टर “छावा” ने बंगाल में केवल ₹13 करोड़ और “सैयारा” ने ₹23 करोड़ की कमाई की थी। ऐसे में अगर “The Bengal Files” राज्य में रिलीज़ होती भी, तो कुल कलेक्शन पर बड़ा असर नहीं पड़ता।
“The Kashmir Files” ने दर्शकों की भावनाओं को झकझोरा था क्योंकि वह मुद्दा आज भी राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा है। इसके विपरीत, “The Bengal Files” का विषय ऐतिहासिक तो है, लेकिन व्यापक जनमानस में उसकी प्रासंगिकता और भावनात्मक जुड़ाव अपेक्षाकृत कम है। साथ ही, फिल्म के प्रचार में भी एक राजनीतिक दृष्टिकोण ज्यादा नजर आया, बजाय एक मानवीय कहानी के।
फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती, सास्वता चटर्जी, निमाशी चक्रवर्ती जैसे बंगाली कलाकारों को शामिल कर स्थानीय जुड़ाव बनाने की कोशिश की गई। लेकिन यह प्रयोग भी बॉक्स ऑफिस पर असर डालने में विफल रहा।
आज के डिजिटल युग में दर्शक OTT प्लेटफॉर्म्स पर फिल्में देखना अधिक पसंद करते हैं। ऐसे में यदि विषय अपीलिंग न हो, तो दर्शक थिएटर तक नहीं जाते। यही स्थिति “The Bengal Files” के साथ दिखी, जहां न तो विवेक के समर्थक आगे आए, और न ही विरोधियों ने कोई विरोध दर्ज कराया कुल मिलाकर उदासीनता का माहौल रहा।
“The Bengal Files” की असफलता दर्शाती है कि सिर्फ राजनीतिक या ऐतिहासिक मुद्दा उठाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि जरूरी है कि फिल्म दर्शकों के भावनात्मक और सामाजिक सरोकारों से जुड़े। विवेक अग्निहोत्री ने अपने विज़न के अनुसार फिल्म तो बना दी, लेकिन जनमानस की नब्ज पकड़ने में चूक कर गए।
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