Vande Mataram: “सन् 997 में एक दिन, निषाद के बाद, एक घुड़सवार विष्णुपुर से मंदरन की ओर अकेला चला जा रहा था।” — यह पंक्ति थी बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के पहले उपन्यास दुर्गेशनंदिनी (1865) की। उसी पंक्ति से बंगला उपन्यासों की यात्रा का आरंभ हुआ। मात्र तीस वर्ष की आयु में बंकिम ने जो साहित्यिक अलख जगाई, वही आगे चलकर भारत के राष्ट्रवाद की नींव बनी। कामलाकांत का दफ्तर, कृष्णकांतर विल, आनंदमठ जैसी रचनाओं के साथ उन्होंने भारतीय चेतना को नया रूप दिया। लेकिन उनके नाम के साथ जो रचना अमर हो गई, वह थी — ‘वंदे मातरम्’।
7 नवंबर 1875 को नैहाटी के कान्थलपाड़ा स्थित अपने घर में बंकिम ने इस गीत की रचना की। यह गीत संस्कृत और बंगला के मिश्रण में लिखा गया था, जिसमें मातृभूमि की आराधना का भाव था। बाद में 1882 में जब यह गीत उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना, तब इसे नई ऐतिहासिक ऊंचाई मिली। धीरे-धीरे यह गीत स्वाधीनता संग्राम का मंत्र बन गया।
बंकिमचंद्र ने एक बार कहा था — “एक दिन देखोगे, यह देश इस गीत से विभोर हो उठेगा।” शायद वे जानते थे कि यह गीत आने वाले समय में एक क्रांति की आवाज बनेगा।
1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में वंदे मातरम् पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया। स्वयं रवीन्द्रनाथ टैगोर ने यह गीत गाया था। इससे पहले उन्होंने इसे अपने संपादित पत्र ‘बालक’ में प्रकाशित किया था। हालांकि बंकिम इसे मल्लार राग में गवाना चाहते थे, टैगोर ने इसे ‘देश’ राग में प्रस्तुत किया। लेकिन बंकिम ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई। दुर्भाग्यवश तब तक वे इस दुनिया से जा चुके थे।
अक्सर यह प्रश्न उठता है कि ‘वंदे मातरम्’ में किसे संबोधित किया गया है — भारत माता को या बंगमाता को? नेताजी सुभाषचंद्र बोस के अनुसार बंकिम यहाँ भारत माता की ही वंदना कर रहे थे। जबकि गीत में उल्लिखित ‘सप्तकोटि’ शब्द बंगाल की जनसंख्या का संकेत देता है। ऋषि अरविंद घोष ने इसे ‘बंगाल का राष्ट्रीय गीत’ कहा था। चाहे बंकिम का आशय जो भी रहा हो, इस गीत ने बंगाल की सीमाओं को लांघकर पूरे भारतवर्ष को एक सूत्र में बांध दिया।
1905 में जब बंगाल विभाजन के खिलाफ आंदोलन हुआ, तब वंदे मातरम् की ध्वनि आसमान तक गूंज उठी। सरला देवी चौधुरानी (रवीन्द्रनाथ की भांजी) ने इसे कांग्रेस अधिवेशन में पुनः गाया। उस समय लाला लाजपत राय ने लाहौर से ‘वंदे मातरम्’ नामक पत्रिका भी निकाली। यह गीत रातोंरात स्वतंत्रता आंदोलन का नारा बन गया।
ब्रिटिश शासन ने इस गीत को देशद्रोही नारा घोषित किया। जो कोई भी इसे सार्वजनिक रूप से कहता, उसे गिरफ्तार कर लिया जाता। लेकिन इस दमन से आंदोलन और प्रबल हुआ। वंदे मातरम् अब केवल गीत नहीं रहा — यह बन गया विद्रोह का अग्निमंत्र।
20वीं सदी की शुरुआत में ‘वंदे मातरम्’ को बोस रिकॉर्ड्स और निकोल रिकॉर्ड कंपनी ने जारी किया। रवीन्द्रनाथ टैगोर, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और सत्यभूषण गुप्ता की आवाज़ों में यह गीत जनता तक पहुँचा। लेकिन 1907 में जब हेमेन्द्र मोहन बोस ने व्यावसायिक रूप से रिकॉर्ड जारी किया, तो पुलिस ने छापा मारकर सारी रिकॉर्डें नष्ट कर दीं। बाद में कुछ प्रतियां बेल्जियम और पेरिस में बची रह गईं — यह इस गीत की अमरता का प्रमाण है।
24 जनवरी 1950 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की — ‘जन गण मन’ राष्ट्रीय गान होगा और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया जाएगा। तब से अब तक 75 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन वंदे मातरम् का जादू आज भी कायम है।
आधुनिक युग में भी संगीतकार ए. आर. रहमान जैसे कलाकारों ने इस गीत को नए रूप में प्रस्तुत किया, जिससे नई पीढ़ी भी इस भावनात्मक मंत्र से जुड़ पाई।‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज़ है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने जब इसे लिखा था, तब शायद उन्हें आभास था कि यह गीत एक दिन करोड़ों भारतीयों के हृदय की धड़कन बन जाएगा। जैसा उन्होंने कहा था — “एक दिन देखोगे, देश इस गीत से विभोर हो उठेगा।” आज वह भविष्यवाणी अक्षरशः सच हो चुकी है।
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