Operation Epic Fury
Operation Epic Fury : अमेरिकी राष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी केंद्र के पूर्व निदेशक जो केंट ने एक सनसनीखेज दावा करते हुए ईरान के साथ हुए संघर्ष का मुख्य जिम्मेदार इजरायल को ठहराया है। केंट, जो डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान महत्वपूर्ण पद पर थे, ने स्पष्ट रूप से कहा कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति को एक ऐसी रणनीतिक भूल की ओर धकेला गया, जिसकी परिणति युद्ध के रूप में हुई। उनके अनुसार, इजरायल ने ट्रंप प्रशासन को यह विश्वास दिलाने में सफलता हासिल की कि ईरान में सत्ता परिवर्तन करना न केवल संभव है, बल्कि यह एक बेहद आसान सैन्य अभियान होगा।
केंट ने रूस टुडे (RT) को दिए एक साक्षात्कार में बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप के आसपास एक बहुत छोटा और प्रभावशली सर्कल बना दिया गया था, जिसने उन्हें किसी भी वैकल्पिक सलाह को सुनने से रोक दिया। इस समूह ने वेनेजुएला में निकोलस मादुरो के खिलाफ चलाए गए अमेरिकी अभियान की सफलता का उदाहरण देकर ट्रंप को गुमराह किया। उन्हें यह यकीन दिलाया गया कि जिस तरह अमेरिकी हस्तक्षेप ने वेनेजुएला में प्रभाव डाला, ठीक उसी तरह अमेरिकी सेना सीधे ईरान में प्रवेश कर वहां के शासन को बिना किसी बड़ी बाधा या ‘गड़बड़ी’ के उखाड़ फेंकेगी।
पूर्व अधिकारी के अनुसार, जनवरी में जब ईरान के भीतर आर्थिक बदहाली और महंगाई के खिलाफ जन-आक्रोश भड़का, तो इजरायल ने इसे एक सुनहरे अवसर के रूप में देखा। इजरायल ने ट्रंप को इस बात के लिए राजी कर लिया कि यदि अमेरिका आईआरजीसी (IRGC) और प्रदर्शनकारियों का दमन करने वाले तत्वों पर बमबारी करता है, तो ईरानी जनता खुद ही सत्ता की कमान संभाल लेगी। केंट ने इस स्थिति की तुलना इराक युद्ध से करते हुए कहा कि ट्रंप को यह सपना दिखाया गया था कि ईरानी लोग अमेरिकी सेना का स्वागत ‘मुक्तिदाता’ के रूप में करेंगे।
जो केंट ने ट्रंप के कार्य करने के तरीके और उनके आसपास के वातावरण को ‘ट्रूमैन शो’ (एक कृत्रिम वास्तविकता) करार दिया। उन्होंने बताया कि हालांकि ट्रंप इस पूरे ऑपरेशन को लेकर शुरू में काफी संशय में थे, लेकिन उनके सलाहकारों ने ऐसा माहौल तैयार किया कि वे इसके लिए राजी हो गए। यह खुलासा ऐसे समय में आया है जब 28 फरवरी को तेहरान में सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद ईरान-अमेरिका संबंध पूरी तरह युद्ध की आग में झोंक दिए गए थे। केंट का मानना है कि यह सब एक योजनाबद्ध साजिश का हिस्सा था।
केंट के दावों के विपरीत, डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू दोनों ने ही लगातार इन आरोपों का खंडन किया है। दोनों नेताओं का आधिकारिक रुख यह रहा है कि तेल अवीव ने वाशिंगटन को किसी भी युद्ध के लिए उकसाया नहीं था। हालांकि, केंट का यह बयान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे रहा है, जो यह संकेत देता है कि युद्ध के फैसले जमीनी हकीकत के बजाय बाहरी दबाव और गलत सूचनाओं के आधार पर लिए गए थे।
जो केंट का यह बयान न केवल इजरायल और अमेरिका के रिश्तों पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे खुफिया सूचनाओं को राजनीतिक लाभ के लिए मरोड़ा जा सकता है। ईरान के साथ छिड़ी यह जंग न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बनी, बल्कि इसने वैश्विक कूटनीति के उन छिपे हुए पहलुओं को भी उजागर कर दिया है, जहाँ ‘आसान ऑपरेशन’ के नाम पर बड़े मानवीय संकट खड़े किए जाते हैं। 29 अप्रैल को होने वाले आगामी घटनाक्रमों पर अब दुनिया की नजरें टिकी हैं।
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