Trump Iran Strategy: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा दशकों पुराना तनाव अब एक अत्यंत खतरनाक और निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह नियंत्रित करने और उस पर वैश्विक दबाव बनाने के लिए एक बड़ा सैन्य दांव चला है। ट्रंप की नई ‘मिडल ईस्ट मिलिट्री स्ट्रैटेजी’ के तहत दुनिया के सबसे शक्तिशाली और विशाल विमानवाहक पोत को ईरान की समुद्री सीमा की ओर रवाना कर दिया गया है। इस अचानक हुई सैन्य हलचल ने पूरे पश्चिम एशिया में युद्ध की आहट को तेज कर दिया है, जिससे वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।

यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड: कैरेबियन से मध्य पूर्व तक का सफर
राष्ट्रपति ट्रंप ने दुनिया के सबसे बड़े विमानवाहक पोत ‘यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड’ को कैरेबियन सागर से हटाकर तुरंत मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) भेजने का ऐतिहासिक आदेश दिया है। दिलचस्प बात यह है कि यह युद्धपोत पहले वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ चल रहे मिशन के लिए तैनात था। ट्रंप ने अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं को अचानक बदलते हुए इसे ईरान की दहलीज पर तैनात करने का निर्णय लिया है। प्रशासन का यह आक्रामक कदम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका अब ईरान के परमाणु ठिकानों के खिलाफ किसी भी स्तर की सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है।
दोहरे बेड़े की तैनाती: अमेरिका की अभूतपूर्व मारक शक्ति
मध्य पूर्व के इस अशांत समुद्री क्षेत्र में अमेरिका की पकड़ अब और भी मजबूत हो गई है। यहाँ ‘यूएसएस अब्राहम लिंकन’ विमानवाहक पोत पहले से ही गश्त कर रहा है, जिसके साथ तीन अत्याधुनिक मिसाइल डिस्ट्रॉयर (विध्वंसक जहाज) भी तैनात हैं। अब ‘यूएसएस फोर्ड’ के वहां पहुंचने से अमेरिका की मारक शक्ति दोगुनी हो गई है। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, इतिहास में यह कम ही देखा गया है कि इतने शक्तिशाली दो नौसैनिक बेड़े एक साथ किसी छोटे क्षेत्र में तैनात किए गए हों। ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन अब ईरान को किसी भी प्रकार की कूटनीतिक ढिलाई देने के मूड में नहीं है।
रणनीतिक यू-टर्न: पश्चिमी गोलार्ध से हटा ट्रंप का ध्यान
ट्रंप का यह फैसला उनकी पूर्व घोषित उस रणनीति में एक बड़ा बदलाव है, जिसमें उन्होंने अमेरिका के ‘पश्चिमी गोलार्ध’ यानी अपने नजदीकी समुद्री इलाकों की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही थी। हालांकि, इस हफ्ते की शुरुआत में एक सोशल मीडिया चर्चा के दौरान उन्होंने मध्य पूर्व में अतिरिक्त सैन्य शक्ति भेजने के संकेत दिए थे। वर्तमान में व्हाइट हाउस ने इस संवेदनशील मिशन की बारीकियों पर आधिकारिक चुप्पी साधी हुई है, लेकिन जानकारों का मानना है कि ट्रंप अब ईरान को चारों तरफ से घेरकर उसे घुटने टेकने या बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर करना चाहते हैं।
वैश्विक तेल बाजार और कूटनीति पर आसन्न संकट
अमेरिका की इस भारी सैन्य मौजूदगी का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़ना तय है। फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक रास्तों पर युद्ध के बादल मंडराने से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आने की आशंका है। ट्रंप के इस कड़े रुख ने न केवल ईरान को, बल्कि चीन और रूस जैसे देशों को भी एक कड़ा संदेश दिया है। यदि ईरान की ओर से कोई भी जवाबी प्रतिक्रिया होती है, तो यह तनाव एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में तब्दील हो सकता है, जिसके परिणाम पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी हो सकते हैं।
भविष्य की अनिश्चितता: क्या शांति की गुंजाइश बची है?
आने वाले कुछ हफ्ते पश्चिम एशिया के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं। सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि ईरान अमेरिका की इस ‘गनबोट डिप्लोमेसी’ का जवाब किस तरह देता है। फिलहाल, ट्रंप प्रशासन अपनी आक्रामक नीति के जरिए ईरान को कड़ा सबक सिखाने और उसके परमाणु इरादों को ध्वस्त करने की पूरी तैयारी में नजर आ रहा है। दुनिया भर की नजरें अब उन समुद्री लहरों पर टिकी हैं, जहाँ अमेरिकी युद्धपोत किसी भी पल बड़ी कार्रवाई को अंजाम दे सकते हैं।
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