Iran-US Peace Talks Fail: पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच चल रही शांति वार्ता के असफल होने के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तनाव चरम पर पहुंच गया है। इस विफलता के तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक बड़ा और सख्त बयान सामने आया है। ट्रंप ने चीन को सीधी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि वह ईरान को हथियारों की आपूर्ति करने की कोशिश करता है, तो इसके परिणाम चीन के लिए अत्यंत भयावह होंगे। व्हाइट हाउस के बाहर पत्रकारों से मुखातिब होते हुए ट्रंप ने स्पष्ट किया कि बीजिंग का ईरान की सैन्य मदद करना अमेरिका को कतई मंजूर नहीं है।

खुफिया रिपोर्ट का खुलासा: चीन भेज सकता है एयर डिफेंस सिस्टम
अमेरिकी राष्ट्रपति का यह तीखा बयान उन खुफिया रिपोर्टों के बाद आया है, जिनमें दावा किया गया है कि चीन आने वाले हफ्तों में ईरान को अपनी अत्याधुनिक हवाई रक्षा प्रणालियां (Air Defense Systems) उपलब्ध कराने की योजना बना रहा है। सीएनएन की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने संकेत दिए हैं कि बीजिंग और तेहरान के बीच हथियारों के सौदे को लेकर बातचीत अंतिम चरण में है। ट्रंप ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “अगर चीन ऐसा करता है, तो उन्हें बहुत बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।” यह बयान दर्शाता है कि अमेरिका ईरान की सैन्य शक्ति में किसी भी प्रकार की विदेशी वृद्धि को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है।
ईरान को ‘यूक्रेन’ बनाने की रणनीति: क्या लंबे युद्ध की ओर बढ़ रही दुनिया?
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के इस कड़े रुख के पीछे चीन की वह चाल है, जिसमें वह ईरान को ‘मिडिल ईस्ट का यूक्रेन’ बनाने की कोशिश कर रहा है। जिस प्रकार अमेरिका ने यूक्रेन को हथियारों की खेप भेजकर रूस को एक लंबी और थका देने वाली जंग में फंसा दिया, ठीक वही रणनीति अब चीन ईरान के जरिए अमेरिका के खिलाफ अपनाता दिख रहा है। यदि चीन ईरान को हथियारों की सप्लाई शुरू कर देता है, तो अमेरिका और ईरान के बीच का संघर्ष कई वर्षों तक खिंच सकता है। यह स्थिति न केवल इन दो देशों के लिए, बल्कि पूरे मध्य पूर्व और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बुरे सपने जैसी होगी।
इस्लामाबाद वार्ता की विफलता: 21 घंटे की मैराथन बैठक रही बेनतीजा
इस्लामाबाद के एक होटल में ईरान और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के बीच करीब 21 घंटे तक गहन चर्चा हुई, लेकिन दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े रहे। ईरान की मुख्य मांग थी कि अमेरिका उसकी जब्त की गई अरबों डॉलर की संपत्तियों को तुरंत रिलीज करे और लेबनान को भी किसी भी संभावित युद्धविराम समझौते का हिस्सा बनाए। दूसरी ओर, अमेरिका ने स्पष्ट शर्त रखी थी कि ईरान को अपना परमाणु हथियार कार्यक्रम पूरी तरह बंद करना होगा। शर्तों में तालमेल न बैठने के कारण यह उच्च-स्तरीय वार्ता विफल हो गई, जिससे नाराज होकर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस बैठक बीच में ही छोड़कर अमेरिका रवाना हो गए।
परमाणु जिद और यूरेनियम संवर्धन: शांति की राह में सबसे बड़ा रोड़ा
शांति वार्ता की असफलता के पीछे ईरान का परमाणु रुख सबसे बड़ा कारण बना। ईरान ने साफ कर दिया कि वह परमाणु हथियार बनाने की अपनी महत्वाकांक्षा को नहीं त्यागेगा और यूरेनियम का संवर्धन जारी रखेगा। ईरान का तर्क है कि उसे अपनी रक्षा के लिए परमाणु शक्ति संपन्न होना जरूरी है, जबकि अमेरिका इसे वैश्विक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है। इस गतिरोध ने कूटनीतिक रास्तों को लगभग बंद कर दिया है। अब दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या चीन ट्रंप की चेतावनी को नजरअंदाज कर ईरान को हथियारों की खेप भेजता है, जो सीधे तौर पर एक महायुद्ध की शुरुआत हो सकती है।
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