Tsunami threat Japan : रूस में हाल ही में आए तेज भूकंप के बाद सुनामी की चेतावनी जारी की गई है। इसका असर अब जापान तक पहुंचता नजर आ रहा है, जहां 2011 की विनाशकारी सुनामी की यादें फिर से ताजा हो गई हैं। उस समय जापान में आए भूकंप और सुनामी ने देश को हिला कर रख दिया था। तब समुद्र से उठी लहरों ने 19 हजार से अधिक लोगों की जान ले ली थी और करोड़ों की संपत्ति को नष्ट कर दिया था।

9.1 तीव्रता का भूकंप बना सुनामी की वजह
11 मार्च 2011 को जापान में 9.1 तीव्रता का भीषण भूकंप आया था। यह झटका इतना शक्तिशाली था कि इससे समुद्र में उफान आ गया। भूकंप के कुछ ही समय बाद समुद्र की लहरें ऐसी तेजी से उठीं कि पानी में खड़े जहाज बहते हुए शहरों की सड़कों तक पहुंच गए। नजारा ऐसा था कि गाड़ियों, नावों और जहाजों की कोई सीमा नहीं रह गई थी—सब कुछ पानी में तैरता नजर आ रहा था।
भूकंप से समुद्र में पड़ी बड़ी दरार
इस भूकंप के कारण समुद्र की सतह में लगभग 300 किलोमीटर लंबी और 150 किलोमीटर चौड़ी दरार पड़ गई थी। इस भूगर्भीय हलचल के बाद समुद्री जल में तेजी से बदलाव आया और देखते ही देखते सुनामी की लहरें उठने लगीं। चेतावनी जारी कर दी गई और आसपास के तटीय इलाकों को खाली कराया गया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी—महज कुछ मिनटों में पानी शहर के अंदर तक घुस आया।
1900 के बाद जापान का सबसे खतरनाक भूकंप
विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1900 के बाद यह जापान में आया सबसे भयानक भूकंप था। इसके पहले केवल तीन ऐसे बड़े भूकंप दर्ज किए गए थे। भले ही वक्त रहते सायरन बजाकर लोगों को चेताया गया, लेकिन तबाही इतनी तेज थी कि 19 हजार के करीब लोगों की जान चली गई। लाखों लोग बेघर हो गए और देश की अर्थव्यवस्था पर भी इसका गहरा असर पड़ा।
वायरल हो रहे हैं उस त्रासदी के वीडियो
सुनामी के कई लाइव वीडियो आज भी इंटरनेट पर मौजूद हैं, जो 2011 की उस भयावह घटना की झलक दिखाते हैं। इन वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे एक शांत और सुनसान शहर कुछ ही मिनटों में पानी के समंदर में बदल गया। बहती हुई कारें, डूबती इमारतें और लहरों के साथ आगे बढ़ते जहाज आज भी उस त्रासदी की भयानकता को बयां करते हैं।
खतरा अभी टला नहीं, सतर्कता जरूरी
रूस में आए हालिया भूकंप के बाद जापान समेत कई देशों में सुनामी का खतरा फिर से मंडरा रहा है। ऐसे में 2011 की घटना से सबक लेना जरूरी है। वैज्ञानिक भले ही चेतावनी तंत्र को मजबूत कर रहे हों, लेकिन ऐसी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए व्यापक तैयारी की जरूरत अब भी बनी हुई है।
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