Iran-US Ceasefire
Iran-US Ceasefire : पश्चिम एशिया में लगभग 40 दिनों तक चले खूनी संघर्ष के बाद ईरान और अमेरिका के बीच घोषित दो सप्ताह के युद्धविराम (Ceasefire) का दुनिया भर में स्वागत हो रहा है। हालांकि, इस शांति प्रक्रिया ने क्षेत्र के एक शक्तिशाली देश, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को बुरी तरह नाराज कर दिया है। यूएई की इस नाराजगी का मुख्य कारण समझौते की शर्तें नहीं, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया में अपनाई गई कूटनीतिक कार्यप्रणाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटनाक्रम ने खाड़ी देशों के बीच आपसी विश्वास और रणनीतिक समीकरणों को एक नए संकट में डाल दिया है।
यूएई की नाराजगी के केंद्र में इस बार ईरान से ज्यादा पाकिस्तान है। दरअसल, पाकिस्तान ने इस सीजफायर को अंजाम देने में एक प्रमुख ‘मैसेंजर’ और मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। यूएई के नीति निर्माताओं का आरोप है कि पाकिस्तान ने केवल अमेरिका के इशारों पर काम किया और इस पूरी प्रक्रिया के दौरान यूएई जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय साझेदार को अंधेरे में रखा। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान ने मध्यस्थता के दौरान यूएई के सामरिक हितों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। अमीरात इसे एक ‘धोखा’ मान रहा है क्योंकि सीजफायर के आधिकारिक संदेशों और दस्तावेजों में यूएई का कहीं जिक्र तक नहीं किया गया, जबकि वह इस युद्ध का सबसे बड़ा भुगतभोगी रहा है।
अमीरात की नाराजगी का एक ठोस मानवीय और आर्थिक कारण भी है। युद्ध के दौरान यूएई को भीषण तबाही का सामना करना पड़ा था। ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, जंग के दौरान ईरान ने यूएई के प्रमुख आर्थिक केंद्रों—दुबई, शारजाह और अबू धाबी पर 2000 से अधिक हमले किए। यूएई के रक्षा मंत्रालय के आंकड़े डरावने हैं; पिछले एक महीने में ही देश पर 2200 ड्रोन, 500 बैलिस्टिक मिसाइलों और 26 क्रूज मिसाइलों से प्रहार किया गया। इन हमलों में 10 अमीराती नागरिकों की जान गई और अरबों डॉलर की संपत्ति का नुकसान हुआ। अब यूएई का सवाल यह है कि यदि ईरान भविष्य में फिर से हमला करता है, तो इसकी गारंटी कौन लेगा? सीजफायर की वर्तमान शर्तों में सुरक्षा की कोई स्पष्ट गारंटी नहीं दी गई है।
रणनीतिक मोर्चे पर भी यूएई खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) को लेकर जो समझौता हुआ है, उसे यूएई के राष्ट्रीय हितों के विपरीत माना जा रहा है। पाकिस्तान ने इस संवेदनशील मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र (UN) में वोटिंग से दूरी बनाए रखी और बाद में डील के दौरान ईरान की शर्तों को स्वीकार कर लिया। यह यूएई के लिए एक बड़ा राजनयिक झटका है क्योंकि वह लंबे समय से होर्मुज जलमार्ग पर नियंत्रण के लिए एक अंतरराष्ट्रीय सैन्य बल गठित करने की वकालत कर रहा था। पाकिस्तान द्वारा ईरान की शर्तों के आगे झुकना यूएई की वर्षों की मेहनत पर पानी फेरने जैसा है।
यूएई और ईरान के बीच का तनाव केवल ताजा युद्ध तक सीमित नहीं है; दोनों देशों के बीच 1905 से फारस की खाड़ी के तीन द्वीपों को लेकर क्षेत्रीय विवाद चल रहा है। हालिया जंग के दौरान यूएई ने ईरानी नागरिकों पर कड़े प्रतिबंध लगाकर तेहरान के शासन को आर्थिक रूप से कमजोर करने की कोशिश की थी। अब सीजफायर के बाद पाकिस्तान और ईरान की बढ़ती नजदीकी ने यूएई की चिंताएं बढ़ा दी हैं। मध्यस्थ की भूमिका से मिली उपेक्षा के बाद, अब यह कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या यूएई अपनी विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव करेगा? इस घटनाक्रम ने मिडिल ईस्ट में एक नए कूटनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना पैदा कर दी है, जहाँ पुराने मित्र अब एक-दूसरे को शक की निगाह से देख रहे हैं।
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