Shankaracharya Controversy
Shankaracharya Controversy: प्रयागराज माघ मेला 2026 के दौरान प्रशासनिक अधिकारियों और अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बीच शुरू हुआ गतिरोध अब एक बड़े राजनीतिक विवाद में तब्दील हो चुका है। अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को ‘छद्म हिंदू’ करार देने और गौवंश के मुद्दे पर घेरे जाने के बाद अब सरकार ने पलटवार किया है। अविमुक्तेश्वरानंद ने सरकार को चेतावनी दी थी कि यदि 40 दिनों के भीतर गौ माता को ‘राष्ट्रमाता’ घोषित नहीं किया गया और गौमांस का निर्यात बंद नहीं हुआ, तो वह मुख्यमंत्री को गैर-हिंदू घोषित कर देंगे। इस तीखे हमले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह ने मोर्चा संभाला है।
यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह ने अविमुक्तेश्वरानंद के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें ‘झूठा’ करार दिया है। मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद तथ्यों से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं और केवल भ्रम फैलाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि 2017 में सत्ता संभालते ही योगी सरकार का सबसे पहला और ऐतिहासिक निर्णय अवैध बूचड़खानों को बंद करना था। मंत्री ने आरोप लगाया कि अविमुक्तेश्वरानंद उन ‘गौकशों’ (गौ हत्यारों) के दबाव में काम कर रहे हैं जो उत्तर प्रदेश में अराजकता फैलाना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग पहले गौकशी करवाते थे, वे ही आज अविमुक्तेश्वरानंद के ‘आका’ बने हुए हैं।
गौमांस निर्यात के आरोपों पर सफाई देते हुए कैबिनेट मंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश में गौमांस और गौकशी पर पूर्ण प्रतिबंध है। योगी सरकार ने गौहत्या अधिनियम को न केवल सख्त बनाया है, बल्कि अपराधियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) जैसी कड़ी धाराओं के तहत कार्रवाई भी सुनिश्चित की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य में केवल कानूनी तौर पर सुअर और बकरी के मांस (मटन) का कारोबार ही मान्य है। मंत्री के अनुसार, सरकार की नीति गौ-संरक्षण को लेकर पूरी तरह पारदर्शी है और इसमें किसी भी प्रकार की कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू तब सामने आया जब धर्मपाल सिंह ने अविमुक्तेश्वरानंद की ‘शंकराचार्य’ के रूप में मान्यता को ही चुनौती दे दी। मंत्री ने कहा कि ‘शंकराचार्य’ कोई संवैधानिक पद नहीं है, बल्कि यह मठों और धार्मिक परंपराओं का विषय है। उन्होंने कड़े लहजे में कहा कि सरकार ने अविमुक्तेश्वरानंद को कभी शंकराचार्य नहीं माना है और न ही किसी आधिकारिक मंच से उन्हें यह मान्यता दी गई है। उन्होंने चेतावनी दी कि किसी भी धार्मिक पद को राजनीति का औजार नहीं बनने दिया जाएगा और जो व्यक्ति धर्म की आड़ में भ्रम फैलाएगा, उसे सरकारी मान्यता मिलना असंभव है।
पूरे विवाद की जड़ वाराणसी में हुई वह प्रेस कॉन्फ्रेंस है, जिसमें अविमुक्तेश्वरानंद ने सरकार को सीधा चैलेंज दिया था। उन्होंने कहा था, “अगर आप खुद को सच्चा हिंदू मानते हैं, तो उत्तर प्रदेश से गौमांस का निर्यात बंद करें और गौ माता को राष्ट्रमाता का दर्जा दें।” उन्होंने सरकार को 40 दिन का समय देते हुए कहा था कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो वे मुख्यमंत्री को हिंदू समाज से बाहर (गैर-हिंदू) करार देने का आह्वान करेंगे। इसी बयान ने सरकार को भड़का दिया, जिसके परिणामस्वरुप अब आर-पार की जंग छिड़ गई है।
अविमुक्तेश्वरानंद और योगी सरकार के बीच का यह विवाद केवल गौवंश तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह अब व्यक्तिगत और पद की गरिमा तक पहुँच चुका है। एक तरफ जहाँ अविमुक्तेश्वरानंद धर्म की दुहाई दे रहे हैं, वहीं सरकार इसे राजनीतिक प्रोपेगेंडा बता रही है। आने वाले 40 दिन उत्तर प्रदेश की राजनीति और धार्मिक गलियारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं।
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