Ayatollah Khamenei death: 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए आकस्मिक सैन्य हमले ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया है। इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है, जिसने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक और कानूनी विवाद को जन्म दे दिया है। आलोचकों का तर्क है कि यह सैन्य कार्रवाई न केवल अमेरिकी कांग्रेस की अवहेलना है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के नियमों का भी खुला उल्लंघन है। यह घटना अब केवल युद्ध तक सीमित नहीं रही, बल्कि वैश्विक संधियों और संवैधानिक अधिकारों की कसौटी पर भी कसी जा रही है।

एग्जीक्यूटिव ऑर्डर 12333 और राजनीतिक हत्याओं पर प्रतिबंध
1970 के दशक में चर्च कमेटी की जांच के बाद अमेरिका ने विदेशी नेताओं की हत्या को लेकर सख्त नियम बनाए थे। 1979 में राष्ट्रपति जेराल्ड फोर्ड ने एक आदेश जारी किया था, जो बाद में ‘एग्जीक्यूटिव ऑर्डर 12333’ का हिस्सा बना। इस कानून के तहत अमेरिका की कोई भी एजेंसी किसी विदेशी नेता की हत्या की साजिश में शामिल नहीं हो सकती। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, खामेनेई की हत्या इस आदेश का सीधा उल्लंघन है। आरोप है कि सीआईए (CIA) ने खामेनेई की सटीक लोकेशन इजराइल को साझा की, जिसके आधार पर हमला हुआ। यदि यह सहयोग सिद्ध होता है, तो अमेरिका कानूनी रूप से इस “राजनीतिक हत्या” के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार होगा।
सैन्य कमांडर या नागरिक: खामेनेई की स्थिति पर कानूनी पेंच
अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी सैन्य कमांडर को युद्ध के दौरान निशाना बनाना वैध हो सकता है, लेकिन खामेनेई के मामले में स्थिति जटिल है। वे सेना की वर्दी में नहीं थे और तकनीकी रूप से एक नागरिक थे, हालांकि वे सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर भी थे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस हमले में वे मारे गए, वही इस युद्ध की शुरुआत थी। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, शांति काल में किसी विदेशी नेता की हत्या अवैध है, जब तक कि वह किसी तत्काल हमले (Imminent Threat) की योजना न बना रहा हो। बिना औपचारिक युद्ध के किसी राष्ट्र प्रमुख को मारना ‘स्टेट स्पॉन्सर्ड असैसिनेशन’ की श्रेणी में आता है।
ट्रंप की आत्मरक्षा की दलील और सुरक्षा परिषद के नियम
इस मामले पर राष्ट्रपति ट्रंप ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि उन्होंने ‘कमांडर इन चीफ’ के अधिकारों का प्रयोग करते हुए अमेरिकी सैनिकों और ठिकानों की रक्षा के लिए यह कदम उठाया। उनका तर्क है कि ईरान परमाणु हथियार और लंबी दूरी की मिसाइलें विकसित कर रहा था, जो अमेरिका और मध्य पूर्व के लिए एक बड़ा खतरा बन चुके थे। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र (UN) चार्टर के अनुसार, कोई भी देश आत्मरक्षा या सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना दूसरे देश की संप्रभुता पर बल प्रयोग नहीं कर सकता। कानूनी विशेषज्ञ रेबेका इंगबर के अनुसार, यदि मूल हमला ही अवैध था, तो उसके तहत की गई हत्या को सही नहीं ठहराया जा सकता।
अहमदीनेजाद की मौत और अमेरिकी संविधान का उल्लंघन
ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें एक और हमले से बढ़ गई हैं जिसमें ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद की भी मौत हुई। चूंकि वे उस समय किसी सैन्य पद पर नहीं थे, इसलिए उन्हें निशाना बनाने का कोई कानूनी आधार नजर नहीं आता। इसके अतिरिक्त, अमेरिकी संविधान के तहत युद्ध की घोषणा का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है। 1973 के ‘वॉर पावर्स एक्ट’ के बाद से बड़े सैन्य अभियानों के लिए कांग्रेस की अनुमति अनिवार्य रही है। ईरान के खिलाफ यह कार्रवाई दशकों बाद की सबसे बड़ी एकतरफा सैन्य कार्रवाई मानी जा रही है, जिसने राष्ट्रपति के विशेषाधिकारों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या होगी सजा और क्या है भविष्य की संभावना?
इतिहास गवाह है कि 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के समय भी इसी तरह के कानूनी सवाल उठे थे। यदि ‘एग्जीक्यूटिव ऑर्डर 12333’ का उल्लंघन साबित होता है, तो आमतौर पर किसी को आपराधिक सजा नहीं मिलती, लेकिन यह एक बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक संकट बन जाता है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की साख को प्रभावित करता है और भविष्य में अन्य देशों के लिए भी ऐसे ही “अवैध हमलों” का रास्ता खोल सकता है। फिलहाल, यह मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और अमेरिकी संसद के बीच एक लंबी कानूनी लड़ाई का केंद्र बनने वाला है।

















