अंतरराष्ट्रीय

US Iran Nuclear: जेनेवा में महाशक्तियों की भिड़ंत, ट्रंप की ‘आखिरी चेतावनी’ के बाद क्या झुकेगा ईरान?

US Iran Nuclear : मध्य पूर्व में बढ़ते भीषण सैन्य तनाव और अनिश्चितता के बीच, वैश्विक शांति की दिशा में एक बड़ी खबर सामने आई है। ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल-बुसैदी ने पुष्टि की है कि अमेरिका और ईरान के बीच अगले दौर की परमाणु वार्ता आगामी गुरुवार को जेनेवा में आयोजित की जाएगी। ओमान, जो लंबे समय से दोनों प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य कर रहा है, ने पिछले सप्ताह भी वार्ता के प्रारंभिक दौर की सुविधा प्रदान की थी। अल-बुसैदी ने सोशल मीडिया पर इस विकास पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि वे इस जटिल सौदे को अंतिम रूप देने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

तेहरान की कूटनीतिक उम्मीदें और स्टीव विटकॉफ से मुलाकात

ईरान के शीर्ष राजनयिक और विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी इस वार्ता की पुष्टि करते हुए सकारात्मक संकेत दिए हैं। अराघची ने उम्मीद जताई है कि वे जेनेवा में अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ के साथ आमने-सामने की मेज पर बैठेंगे। सीबीएस को दिए एक साक्षात्कार में अराघची ने कहा कि परमाणु मुद्दे पर कूटनीतिक समाधान की “अच्छी संभावना” अभी भी बनी हुई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान अभी भी एक मसौदा प्रस्ताव पर काम कर रहा है और उन्हें उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में एक ठोस समझौता तैयार हो जाएगा। हालांकि, उन्होंने यह भी दोहराया कि ईरान को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम संवर्धन का संप्रभु अधिकार है।

ट्रंप की सख्त चेतावनी: वार्ता की विफलता पर सैन्य हमले की आशंका

एक तरफ जहाँ कूटनीतिक मेज सजाई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का रुख बेहद कड़ा नजर आ रहा है। ट्रंप प्रशासन ने मध्य पूर्व में दशकों की सबसे बड़ी सैन्य उपस्थिति सुनिश्चित की है और ईरान से बड़ी रियायतों की मांग कर रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को कड़े लहजे में चेतावनी दी कि यदि जेनेवा वार्ता किसी सार्थक परिणाम तक पहुँचने में विफल रहती है, तो ईरान के खिलाफ “सीमित सैन्य हमले” एक संभावित विकल्प हो सकते हैं। अमेरिका का स्पष्ट रुख है कि ईरान के पास न तो परमाणु हथियार होने चाहिए और न ही उन्हें बनाने की तकनीकी क्षमता।

“हम ईरानी हैं, झुकेंगे नहीं”: तेहरान का कड़ा संदेश

दबाव की राजनीति के बीच ईरान के तेवर भी ढीले नहीं पड़े हैं। विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अपनी राष्ट्रीय अस्मिता का परिचय देते हुए लिखा, “क्या आप जानना चाहते हैं कि हम आत्मसमर्पण क्यों नहीं करते? क्योंकि हम ईरानी हैं।” यह बयान स्पष्ट करता है कि ईरान किसी भी ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेगा जो उसके राष्ट्रीय सम्मान के विरुद्ध हो। वहीं, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने कहा है कि यद्यपि हालिया वार्ताओं में कुछ उत्साहजनक संकेत मिले हैं, लेकिन ईरान अमेरिकी कार्रवाइयों पर बारीकी से नजर रख रहा है और किसी भी युद्ध जैसे परिदृश्य के लिए पूरी तरह तैयार है।

2015 के समझौते से लेकर वर्तमान गतिरोध तक का सफर

उल्लेखनीय है कि यह विवाद साल 2018 में तब गहराया था जब तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका को 2015 के ऐतिहासिक परमाणु समझौते (JCPOA) से एकतरफा बाहर कर लिया था। उसके बाद से ही दोनों देशों के बीच संवाद लगभग ठप था। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने मिसाइल कार्यक्रम को सीमित करे और क्षेत्रीय सशस्त्र समूहों से संबंध तोड़े, जबकि ईरान केवल परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा करने पर अड़ा है। ईरान का दावा है कि उसका कार्यक्रम पूर्णतः शांतिपूर्ण है, जबकि वाशिंगटन और उसके सहयोगी इसे परमाणु हथियार विकसित करने की एक गुप्त योजना के रूप में देखते हैं।

क्षेत्रीय स्थिरता और भविष्य की राह

गुरुवार को होने वाली यह वार्ता न केवल दो देशों के भविष्य के लिए बल्कि पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। यदि जेनेवा में कोई सहमति बनती है, तो यह वर्षों से चले आ रहे प्रतिबंधों और सैन्य खतरों के दौर को समाप्त कर सकती है। दुनिया भर की नजरें अब जेनेवा पर टिकी हैं, जहाँ कूटनीति और युद्ध के खतरों के बीच एक महीन रेखा खिंची हुई है।

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