US-Iran Crisis: मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) में जारी विनाशकारी युद्ध को रोकने और एक स्थायी समाधान निकालने की दिशा में शुक्रवार का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद एक हाई-प्रोफाइल कूटनीतिक बैठक की मेजबानी करने जा रही है। इस बैठक में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची एक मेज पर बैठेंगे। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि इस त्रिपक्षीय वार्ता से न केवल अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव में कमी आएगी, बल्कि पूरे क्षेत्र में स्थायी शांति की एक नई उम्मीद भी जगेगी।
एक तरफ जहाँ इस्लामाबाद में कूटनीति की बिसात बिछ रही है, वहीं दूसरी ओर रूस ने इस पूरे मामले में बेहद कड़ा रुख अपनाया है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने अपने ईरानी समकक्ष के साथ फोन पर हुई बातचीत के दौरान दो टूक कहा कि किसी भी शांति समझौते या सीजफायर का कोई अर्थ नहीं होगा यदि उसमें लेबनान को शामिल नहीं किया जाता। रूस का स्पष्ट मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता तभी संभव है जब इजरायल लेबनान पर अपने हमले तुरंत रोके। लावरोव के इस बयान ने इजरायल और उसके सहयोगियों पर कूटनीतिक दबाव बढ़ा दिया है।
रूस के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने एक आधिकारिक बयान जारी कर लेबनान में इजरायल द्वारा की जा रही सैन्य कार्रवाई की तीखी निंदा की है। उन्होंने कहा कि इजरायल के ये “आक्रामक कदम” शांति की दिशा में किए जा रहे अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को विफल कर सकते हैं। रूस ने स्पष्ट संकेत दिया है कि यदि सभी पक्षों ने संयम नहीं बरता, तो मध्य पूर्व का संकट नियंत्रण से बाहर हो जाएगा। रूस चाहता है कि युद्ध के मैदान के बजाय समाधान मेज पर बैठकर निकाला जाए, ताकि मानवीय क्षति को रोका जा सके।
इस्लामाबाद शिखर सम्मेलन की संवेदनशीलता को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी सक्रिय हो गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बात की और उन्हें लेबनान में जारी हमलों की तीव्रता कम करने की सलाह दी। ट्रंप का मानना है कि ईरान के साथ होने वाले संभावित सीजफायर को सफल बनाने के लिए इजरायल का पीछे हटना जरूरी है। अमेरिकी प्रशासन को डर है कि यदि इजरायल के हमले जारी रहे, तो ईरान वार्ता की मेज से हट सकता है, जिससे शांति की पूरी कोशिश बेकार हो जाएगी।
भले ही कूटनीतिक स्तर पर बड़ी बातें की जा रही हों, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। वॉशिंगटन और तेहरान के बीच सीजफायर के शुरुआती ऐलान के बाद भी हिंसा का सिलसिला थमा नहीं है। हाल ही में ईरान के एक बड़े रिफाइनरी प्लांट को निशाना बनाया गया, जिसके जवाब में ईरान ने कुवैत और बहरीन की दिशा में आक्रामक रुख अपनाया। वहीं, इजरायल ने भी अपनी सैन्य शक्ति का परिचय देते हुए चंद मिनटों में 100 से अधिक मिसाइलें दाग दीं। इन हमलों ने यह साबित कर दिया है कि कागजों पर किया गया समझौता असलियत में लागू करना एक बड़ी चुनौती है।
आज की इस्लामाबाद बैठक केवल एक औपचारिक मुलाकात नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र के भविष्य का फैसला करने वाली घड़ी है। एक तरफ जहाँ दुनिया की महाशक्तियां और मध्यस्थ देश युद्ध रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आपसी अविश्वास और निरंतर होते हमले इस प्रक्रिया को कमजोर कर रहे हैं। यदि जेडी वेंस और अब्बास अराघची किसी ठोस नतीजे पर पहुँचते हैं, तो यह आधुनिक कूटनीति की सबसे बड़ी जीत होगी। अन्यथा, मध्य पूर्व एक ऐसे अंतहीन युद्ध की ओर बढ़ जाएगा जिससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और शांति प्रभावित होगी।
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