ande Mataram:
Vande Mataram:लोकसभा में ‘वंदे मातरम्’ के 150 साल पूरे होने पर चल रही 10 घंटे की चर्चा में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भाग लिया। उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ के इतिहास के पन्ने पलटते हुए कहा कि यह गीत भारत के इतिहास, वर्तमान और भविष्य के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है। राजनाथ सिंह ने कहा कि इसी गीत ने ब्रिटिश साम्राज्य से लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को अभूतपूर्व ताकत दी थी और सदियों से सोया हुआ देश इस गीत की वजह से जाग उठा था। यह गीत आधी स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरक बना और इसकी आवाज इंग्लिश चैनल पार कर ब्रिटिश पार्लियामेंट तक पहुँच गई थी।
रक्षा मंत्री ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि आज जब हम ‘वंदे मातरम्’ के 150 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं, तब भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि गीत के साथ जो न्याय होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि आज़ाद भारत में राष्ट्रगान (जन-गण-मन) और राष्ट्रगीत (वंदे मातरम्) को बराबर का दर्जा देने की बात की गई, लेकिन एक गीत को तो वह स्थान मिला, जबकि दूसरे गीत, ‘वंदे मातरम्’ को कमजोर कर दिया गया और खंडित कर दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस धरती पर ‘वंदे मातरम्’ की रचना हुई थी, उसी धरती पर 1937 में कांग्रेस ने इस गीत को खंडित करने का फैसला लिया।
राजनाथ सिंह ने ‘वंदे मातरम्’ के साथ हुए राजनीतिक छल और अन्याय को ‘इतिहास का बहुत बड़ा छल’ बताया। उन्होंने कहा कि सभी पीढ़ियों को इस अन्याय के बारे में जानना चाहिए, क्योंकि अन्याय केवल एक गीत के साथ नहीं, बल्कि आजाद भारत के लोगों के साथ हुआ था, जिनकी साँसों में आजादी की हवा ‘वंदे मातरम्’ की पुकार से भरी थी। उस पुकार को सीमाओं में बांधने की कोशिश की गई।
उन्होंने जोर दिया, “इसलिए हम ये मानते हैं कि ‘वंदे मातरम्’ का गौरव लौटाना यह समय की मांग है और राष्ट्रीय एकता का तकाजा भी है।” उन्होंने कहा कि इस अन्याय के बावजूद, ‘वंदे मातरम्’ का वजूद किसी भी सूरत में कम नहीं हुआ, यह स्वयं में पूर्ण है, और हमेशा राष्ट्रीय भावना का अमरगीत रहा है और रहेगा।
रक्षा मंत्री ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि ‘वंदे मातरम्’ के साथ हुआ अन्याय एक आइसोलेटेड इंसिडेंट नहीं था, बल्कि यह उस तुष्टिकरण की राजनीति की शुरुआत थी जिसे कांग्रेस ने अपनाया। उन्होंने दावा किया कि इसी राजनीति ने देश का विभाजन कराया और आजादी के बाद सांप्रदायिक सौहार्द और एकता को कमजोर किया। उन्होंने कहा कि आज सरकार ‘वंदे मातरम्’ की गरिमा को फिर से स्थापित कर रही है। उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ लोग ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन-गण-मन’ के बीच दीवार बनाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन सरकार के लिए राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों एक समान और सम्मान की बात हैं।
राजनाथ सिंह ने ‘वंदे मातरम्’ के संघर्षों को याद करते हुए कहा कि जब यह गीत पूरे देश में चर्चा में आया, तो ब्रिटिश सरकार भी डर गई थी और उसने एक सर्कुलर जारी किया था, लेकिन फिर भी वे जनता को इसे गाने से रोक नहीं पाए। उन्होंने उस्मानिया विश्वविद्यालय का उदाहरण दिया, जहाँ ‘वंदे मातरम्’ गाने पर रोक लगा दी गई थी। रोक नहीं मानने के कारण मात्र 18 साल के छात्र राम चंद्र को जेल की सज़ा हुई थी, जिन्हें वीर सावरकर ने ‘वंदे मातरम् राम चंद्र’ की उपाधि से नवाजा था। उन्होंने कहा कि यह गीत केवल बंगाल तक सीमित नहीं था, बल्कि भारत में उत्तर से दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक फैल गया था।
रक्षा मंत्री ने अंत में कहा कि सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि भारत के बाहर भी ‘वंदे मातरम्’ भारतवासियों के लिए एक मंत्र की तरह काम कर रहा था। उन्होंने बताया कि शहीद भगत सिंह और शहीद चंद्रशेखर आजाद के पत्रों की शुरुआत भी ‘वंदे मातरम्’ से होती थी। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि ‘वंदे मातरम्’ सिर्फ एक गीत नहीं है, यह हमारी राष्ट्रीयता का सूत्र है और भारत की अंतरआत्मा का स्वर है।
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