Vande Mataram
Vande Mataram: देश के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में लोकसभा में 10 घंटे की चर्चा शुरू हुई, जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। यह अमर रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर, 1875 को की थी। यह गीत पहली बार 1882 में उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ के एक हिस्से के रूप में पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ था।
इस गीत ने 1896 में तब इतिहास रचा जब रवींद्रनाथ टैगोर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के मंच पर इसे गाया। यह पहला अवसर था जब ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया गया, जिसने हजारों लोगों को भावुक कर दिया। जल्द ही, यह गीत आजादी के आंदोलनों में दूर-दूर तक गूंजने लगा और क्रांतिकारियों में जोश भरने का काम किया। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में हर आंदोलनकारी की जुबान पर यही गीत था, जिसने अंग्रेजों के अंदर डर पैदा कर दिया। इसी कारण 1907 में अंग्रेजों ने इस पर पाबंदी लगा दी और ‘बांटो और राज करो’ की नीति के तहत हिन्दू-मुस्लिमों में फूट डालने का प्रयास किया।
अंग्रेजों ने ‘वंदे मातरम्’ की लोकप्रियता को सांप्रदायिक रंग देने का काम किया। जब यह गीत हर तरफ गूंज रहा था, तो अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग को उकसाने की कोशिश की। 1909 के अमृतसर अधिवेशन में ‘वंदे मातरम्’ का विरोध हुआ, जहाँ अध्यक्ष सैयद अली इमाम ने इसे इस्लाम विरोधी और सांप्रदायिक बताते हुए अस्वीकार कर दिया।
इस गीत में देश को देवी दुर्गा के रूप में देखा गया, जिन्हें ‘रिपुदलवारिणी’ (दुश्मनों का संहार करने वाली) कहा गया। यही ‘रिपुदलवारिणी’ शब्द बड़े विवाद की जड़ बन गया। मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग को यह लगा कि ‘रिपु’ (दुश्मन) शब्द का इस्तेमाल उनके लिए किया गया है, जबकि अधिकतर विशेषज्ञों का मानना था कि यह शब्द अंग्रेजों के लिए इस्तेमाल किया गया था। मुस्लिम लीग ने तर्क दिया कि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी अन्य के प्रति भक्ति या उपासना की मान्यता नहीं है, इसलिए यह गीत इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ है।
आजादी के आंदोलन को सुस्त न पड़ने देने के लिए कांग्रेस पर इस विवाद का हल निकालने का दबाव बढ़ गया था। इसलिए कांग्रेस ने एक महत्वपूर्ण कमेटी का गठन किया, जिसमें रवींद्र नाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू, अबुल कलाम आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस जैसे दिग्गज शामिल थे।
कमेटी ने 1937 में बीच का रास्ता निकाला। उन्होंने पाया कि गीत के पहले के दो पद्य में कोई धार्मिक पहलू नहीं है, वे केवल मातृभूमि की प्रशंसा में हैं, जबकि आगे के पद्यों में हिन्दू देवी-देवताओं का जिक्र किया गया है। इसलिए, यह तय किया गया कि किसी की भावना आहत न हो, इसके लिए सिर्फ शुरू के दो पद्य ही गाए जाएंगे। 1938 के हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में इसी फैसले का पालन किया गया। हालाँकि, इस समाधान से न तो गीत के समर्थक पूरी तरह खुश थे और न ही विरोधी।
मामला तब और बढ़ गया जब मुहम्मद अली जिन्ना ने 17 मार्च, 1938 को पंडित नेहरू को एक पत्र लिखकर ‘वंदे मातरम्’ को पूरी तरह त्यागने की मांग की। जिन्ना का तर्क था कि जिस ‘आनंद मठ’ किताब से यह गीत लिया गया है, वह मुस्लिम विरोधी है। बंकिम के साहित्य पर काम करने वाले विद्वानों ने इस बात को खारिज करते हुए तर्क दिया कि साहित्य में कहीं भी मुसलमानों का विरोध नहीं किया गया है। अंततः, 24 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान सभा ने इस गीत के पहले दो पद्यों को राष्ट्र गीत के रूप में स्वीकार कर लिया।
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