Venezuela Crisis 2026: वैश्विक राजनीति में आए एक भूचाल के बीच, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) सोमवार को वेनेजुएला के मुद्दे पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण आपातकालीन बैठक आयोजित करने जा रही है। इस बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु अमेरिका द्वारा वेनेजुएला में हाल ही में चलाया गया एक गोपनीय सैन्य ऑपरेशन है। इस सैन्य कार्रवाई के तहत अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर लिया है और उन्हें अपने साथ अमेरिका ले गई है। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम ने दुनिया भर के राजनयिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। सुरक्षा परिषद की रोटेटिंग प्रेसीडेंसी इस समय सोमालिया के पास है, जिसने सोमवार सुबह 10 बजे इस सत्र को बुलाने की घोषणा की है।
Venezuela Crisis 2026 : महासचिव एंतोनियो गुटेरेस की गंभीर चिंता और अंतरराष्ट्रीय कानून
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने इस पूरी सैन्य कार्रवाई पर गहरा क्षोभ प्रकट किया है। उनके प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक के माध्यम से जारी बयान में कहा गया कि अमेरिका का यह कदम अंतरराष्ट्रीय संबंधों के इतिहास में एक ‘खतरनाक मिसाल’ कायम कर सकता है। गुटेरेस ने आगाह किया कि संप्रभु राष्ट्र के प्रमुख के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई से पूरे लैटिन अमेरिकी क्षेत्र में अस्थिरता और हिंसा भड़क सकती है। महासचिव ने स्पष्ट रूप से कहा कि भले ही वेनेजुएला की आंतरिक स्थिति जटिल हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए। उन्होंने सभी पक्षों से संयम बरतने और मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है।
Venezuela Crisis 2026: दुनिया का दो गुटों में विभाजन: समर्थन बनाम विरोध
वेनेजुएला की इस घटना ने एक बार फिर शीत युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी है, जहाँ दुनिया के शक्तिशाली राष्ट्र दो स्पष्ट खेमों में बंटे नजर आ रहे हैं।
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विरोध करने वाला पक्ष: रूस, चीन, ईरान, क्यूबा, और उत्तर कोरिया जैसे देशों ने इसे संप्रभुता का हनन बताया है। इनके साथ ही ब्राजील, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका और मलेशिया जैसे उभरते हुए लोकतंत्रों ने भी अमेरिका की इस एकतरफा कार्रवाई की निंदा की है।
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समर्थन करने वाला पक्ष: दूसरी ओर, अर्जेंटीना, इजरायल, फ्रांस, ब्रिटेन और कुछ अन्य यूरोपीय व लातिन अमेरिकी देशों ने अमेरिका का खुलकर साथ दिया है। इन देशों का मानना है कि मादुरो शासन ने लोकतांत्रिक मूल्यों का दमन किया था, इसलिए यह कदम आवश्यक था।
भारत का संतुलित रुख और शांति की अपील
भारत ने इस वैश्विक विवाद में अपनी परंपरागत तटस्थता और शांतिपूर्ण समाधान की नीति को बरकरार रखा है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान जारी कर वेनेजुएला के बिगड़ते हालात पर गहरी चिंता जताई है। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह वहां के नागरिकों की सुरक्षा और भलाई को प्राथमिकता देता है। भारत ने दोनों पक्षों से अपील की है कि वे हिंसा का मार्ग छोड़कर कूटनीतिक बातचीत के जरिए विवादों का निपटारा करें। साथ ही, काराकास में स्थित भारतीय दूतावास को वहां रह रहे भारतीय समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हाई अलर्ट पर रखा गया है।
चीन की कड़ी प्रतिक्रिया: बीजिंग को लगा बड़ा कूटनीतिक झटका
चीन के लिए निकोलस मादुरो का पतन एक बड़े सामरिक और आर्थिक झटके के समान है। चीन ने इस अमेरिकी ऑपरेशन को ‘वर्चस्ववादी कृत्य’ करार देते हुए इसकी कड़ी भर्त्सना की है। चीनी विदेश मंत्रालय ने मांग की है कि मादुरो और उनकी पत्नी को तुरंत रिहा किया जाए और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। उल्लेखनीय है कि ह्यूगो शावेज के समय से ही चीन ने वेनेजुएला के तेल क्षेत्र और बुनियादी ढांचे में अरबों डॉलर का निवेश किया है। बीजिंग का मानना है कि अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी मानदंडों को ताक पर रखकर अपनी ताकत का दुरुपयोग किया है।
रूस का आक्रोश: ‘विचारधारा की दुश्मनी की जीत’
क्रेमलिन ने अमेरिका की इस हरकत को ‘निंदनीय’ बताया है। रूसी विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह अपनी विचारधारा को थोपने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। रूस ने कहा कि बाहरी सैन्य हस्तक्षेप किसी देश की समस्या का समाधान नहीं हो सकता। बयान में जोर दिया गया कि वेनेजुएला के लोगों को अपनी नियति खुद तय करने का अधिकार होना चाहिए। रूस ने स्पष्ट किया कि वह वेनेजुएला के ‘बोलिवेरियन नेतृत्व’ के साथ खड़ा है और राष्ट्रीय हितों की रक्षा में उनके संघर्ष का समर्थन करता है।
इटली और ऑस्ट्रेलिया का मध्यम मार्ग
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने एक जटिल रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि हालांकि इटली ने कभी मादुरो की विवादास्पद जीत को मान्यता नहीं दी, लेकिन तानाशाही खत्म करने के लिए सैन्य कार्रवाई हमेशा सही रास्ता नहीं होती। हालांकि, उन्होंने नशीली दवाओं की तस्करी और हाइब्रिड हमलों के खिलाफ बचाव के संदर्भ में दखल को कुछ हद तक तर्कसंगत माना। वहीं, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने भी बातचीत और कूटनीति पर जोर दिया है। उन्होंने मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए क्षेत्र में तनाव कम करने का आह्वान किया है।
















