West Bengal Assembly : पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे विवाद के बीच कलकत्ता हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष के उस निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी, जिसके तहत टीएमसी के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी गई थी। इस फैसले के बाद फिलहाल ऋतब्रत बनर्जी अपने पद पर बने रहेंगे।
शोभनदेव चट्टोपाध्याय की याचिका को झटका
ऋतब्रत बनर्जी की जगह वरिष्ठ टीएमसी विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने की मांग को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया गया था। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस के फैसले पर सवाल उठाए गए थे। याचिकाकर्ता पक्ष की दलील थी कि पार्टी के मूल नेतृत्व के साथ रहने वाले गुट को सदन में मान्यता मिलनी चाहिए।
सिंगल बेंच के आदेश को दी गई थी चुनौती
इस मामले में पहले कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल पीठ ने विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया था। न्यायमूर्ति कृष्णा राव की पीठ ने कहा था कि मामले की सुनवाई आगे जारी रहेगी। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए तारीख भी तय की थी। हालांकि, इससे पहले ही शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने सिंगल बेंच के आदेश को डिवीजन बेंच के सामने चुनौती दे दी।
टीएमसी के भीतर दो गुटों में बंटा दावा
294 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के 80 विधायक बताए जा रहे हैं। इनमें से करीब 60 विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले विद्रोही गुट के साथ होने का दावा किया गया है। ऋतब्रत बनर्जी ने अपने समर्थन में 64 विधायकों के होने की बात कही थी। वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाले मूल टीएमसी गुट के साथ लगभग 20 विधायक बताए जा रहे हैं।
प्रस्ताव और हस्ताक्षरों को लेकर शुरू हुई जांच
विवाद की शुरुआत उस प्रस्ताव को लेकर हुई, जिसे विधानसभा अध्यक्ष के पास सौंपा गया था। इसमें शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष, असीमा पात्रा और नैना बंद्योपाध्याय को उपनेता प्रतिपक्ष तथा फिरहाद हकीम को मुख्य सचेतक बनाए जाने का प्रस्ताव था। इस प्रस्ताव में कुछ विधायकों के हस्ताक्षरों को लेकर कथित अनियमितता सामने आने के बाद सीआईडी ने जांच शुरू की।
ऋतब्रत और संदीपन ने उठाए थे सवाल
हस्ताक्षरों में कथित विसंगतियों का मुद्दा ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने उठाया था। इसके बाद मामले की जांच सीआईडी को सौंपी गई। जांच शुरू होने के बाद टीएमसी ने दोनों नेताओं को पार्टी से निलंबित कर दिया। इसी घटनाक्रम के बीच पार्टी के भीतर नेतृत्व और सदन में आधिकारिक प्रतिनिधित्व को लेकर विवाद और गहरा गया।
60 विधायकों ने खुद को बताया बहुमत गुट
इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में करीब 60 विधायकों ने खुद को टीएमसी का बहुमत वाला गुट बताते हुए विधानसभा अध्यक्ष को नया प्रस्ताव सौंपा। इस प्रस्ताव में ऋतब्रत बनर्जी को सदन में पार्टी के बहुमत गुट का नेता बनाए जाने की मांग की गई। विधानसभा अध्यक्ष ने प्रस्ताव स्वीकार करते हुए उन्हें आधिकारिक तौर पर नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी।
अदालत के फैसले से ऋतब्रत को राहत
विधानसभा अध्यक्ष के इसी निर्णय के खिलाफ पहले हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में चुनौती दी गई थी। वहां से तत्काल राहत नहीं मिलने के बाद मामला डिवीजन बेंच तक पहुंचा। अब डिवीजन बेंच द्वारा याचिका खारिज किए जाने से ऋतब्रत बनर्जी को फिलहाल बड़ी राहत मिली है। इसके साथ ही पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर चल रहा तत्काल विवाद उनके पक्ष में दिखाई दे रहा है।
टीएमसी के अंदर सियासी संघर्ष जारी
हालांकि अदालत के फैसले से फिलहाल ऋतब्रत बनर्जी की स्थिति मजबूत हुई है, लेकिन टीएमसी के भीतर गुटबाजी का विवाद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। एक ओर बहुमत वाले गुट का दावा है, जबकि दूसरी ओर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के समर्थक विधायक पार्टी के मूल नेतृत्व के साथ खड़े हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में विधानसभा के भीतर और पार्टी संगठन में इस विवाद का असर देखने को मिल सकता है।
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