West Bengal Election 2026
West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। साल 2011 में ममता बनर्जी की ‘मां, माटी, मानुष’ की लहर ने वामपंथी किलों को ध्वस्त कर दिया था, जिसके बाद से लेफ्ट पार्टियां राज्य की चुनावी राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। 34 वर्षों तक बंगाल पर एकछत्र राज करने वाले वामपंथियों का फिलहाल न तो लोकसभा और न ही विधानसभा में कोई प्रतिनिधित्व है। आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए माकपा (CPIM) ने अब अपनी पुरानी खोई हुई जमीन को वापस पाने के लिए ‘मुस्लिम कार्ड’ खेलने की रणनीति बनाई है। लेफ्ट का लक्ष्य अपने उस पुराने मुस्लिम वोट बैंक को वापस खींचना है, जो अब पूरी तरह से तृणमूल कांग्रेस (TMC) का आधार स्तंभ बन चुका है।
2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 27 प्रतिशत थी, लेकिन वर्तमान राजनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा है कि यह आंकड़ा अब 34 प्रतिशत तक पहुँच चुका है। राज्य की 294 सीटों में से करीब 100 सीटों पर यह समुदाय निर्णायक भूमिका निभाता है। पिछले एक दशक में यह वोट बैंक एकतरफा रूप से ममता बनर्जी के पक्ष में रहा है। लेफ्ट अब इसी अभेद्य किले में दरार पैदा करने की कोशिश कर रहा है। माकपा के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम की हालिया गतिविधियां और मुस्लिम नेताओं के साथ उनकी बढ़ती नजदीकियां इसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं।
इस राजनीतिक बिसात पर सबसे चौंकाने वाला नाम हुमायूं कबीर का है। भरतपुर से निलंबित टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर, जिन्होंने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद का शिलान्यास कर सुर्खियां बटोरी थीं, अब लेफ्ट के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभरे हैं। हाल ही में मोहम्मद सलीम और हुमायूं कबीर के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में मुख्य रूप से मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले की सीटों के बंटवारे पर चर्चा हुई। कबीर ने अपनी नई ‘जनता उन्नयन पार्टी’ के बैनर तले माकपा को 6 सीटें और कांग्रेस को 8 सीटें देने का प्रस्ताव रखा है, जबकि शेष 10 सीटों पर वे खुद चुनाव लड़ना चाहते हैं।
बंगाल की राजनीति में केवल लेफ्ट ही सक्रिय नहीं है, बल्कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) भी इस बार पूरी ताकत के साथ उतरने को तैयार है। बिहार और महाराष्ट्र में मिली सफलता के बाद ओवैसी की नजरें अब मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों पर हैं। हुमायूं कबीर अगले हफ्ते हैदराबाद जाकर ओवैसी से मुलाकात करने वाले हैं। माना जा रहा है कि 10 फरवरी तक एआईएमआईएम और हुमायूं कबीर के बीच गठबंधन और सीटों का औपचारिक ऐलान हो सकता है। इसके साथ ही आईएसएफ (ISF) के विधायक नौसाद सिद्दीकी के साथ भी गठबंधन की बातचीत जारी है, जो मुस्लिम युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं।
पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास को देखें तो जब-जब मुस्लिम वोट विभाजित हुआ है, उसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी (BJP) को मिला है। यदि लेफ्ट, एआईएमआईएम, आईएसएफ और हुमायूं कबीर मिलकर एक मोर्चा बनाते हैं, तो यह सीधे तौर पर ममता बनर्जी के कोर वोट बैंक में सेंधमारी होगी। पिछले चुनाव में भाजपा ने अनुसूचित जाति और जनजाति के 24 प्रतिशत वोट हासिल कर 77 सीटें जीती थीं और मुख्य विपक्षी दल बनी थी। अगर इस बार मुस्लिम वोटों का केवल 10-15 प्रतिशत हिस्सा भी टीएमसी से छिटक कर इस नए मोर्चे की तरफ जाता है, तो भाजपा के लिए सत्ता की राह बेहद आसान हो सकती है।
पिछले विधानसभा चुनाव में टीएमसी को 48.02 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि भाजपा को 38.15 प्रतिशत। कांग्रेस और लेफ्ट का खाता तक नहीं खुल सका था। लेकिन इस बार समीकरण बदल रहे हैं। ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने वोट बैंक को एकजुट रखने की है। भाजपा नेतृत्व ने पहले ही बंगाल फतह का संकल्प लिया है और वे जानते हैं कि मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण या विभाजन ही उनकी जीत की कुंजी है। हुमायूं कबीर की ‘जनता उन्नयन पार्टी’ का अकेले 100 सीटों पर लड़ने का दावा करना और फिर गठबंधन की ओर मुड़ना यह दर्शाता है कि बंगाल का मुस्लिम नेतृत्व अब टीएमसी के विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करना चाहता है।
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