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Bengal OBC Reservation : पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण में बड़ा बदलाव, मुस्लिम समुदाय का कोटा हुआ खत्म

Bengal OBC Reservation : पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने राज्य की आरक्षण नीति में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव करने का निर्णय लिया है। राज्य सरकार ने मौजूदा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के कुल आरक्षण को 17 प्रतिशत से भारी कटौती करते हुए अब मात्र 7 प्रतिशत करने का एलान किया है। इस नए फैसले का सबसे बड़ा असर राज्य के मुस्लिम समुदायों पर पड़ने जा रहा है। सरकार ने मुस्लिम समुदायों को मिलने वाले सभी ओबीसी लाभों और आरक्षण को तत्काल प्रभाव से पूरी तरह समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया है। सरकार के इस कदम से राज्य की सियासत में एक नया उबाल आ गया है, क्योंकि यह सीधे तौर पर एक बड़े वर्ग के सामाजिक और आर्थिक कोटे को प्रभावित करता है।

नई नीति के तहत केवल ‘वास्तविक पिछड़े हिंदुओं’ को मिलेगा लाभ

राज्य सरकार द्वारा जारी की गई नई आरक्षण नीति के नियमों के मुताबिक, पहले पश्चिम बंगाल में ओबीसी कैटेगरी-ए के तहत 10 प्रतिशत और ओबीसी कैटेगरी-बी के तहत 7 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू थी। लेकिन अब इस दोहरी व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है और राज्य में केवल कुल 7 प्रतिशत आरक्षण ही प्रभावी रहेगा। सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि नई नीति के अंतर्गत यह बचा हुआ आरक्षण केवल उन “वास्तविक पिछड़े हिंदू समुदायों” को ही दिया जाएगा, जो पहले से अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की श्रेणी में शामिल नहीं हैं। इस नए वर्गीकरण के बाद अब बंगाल में केवल 66 जातियां और समुदाय ही ओबीसी आरक्षण के दायरे में बचे रहेंगे। केवल इन्हीं जातियों को सरकारी नौकरियों, दाखिलों और अन्य सरकारी पदों पर 7 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिल सकेगा।

सरकार का तर्क: पिछली नीति ‘वोट बैंक राजनीति’ से थी प्रेरित

इस बड़े और कड़े फैसले को लेकर पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार ने अपना मजबूत दावा पेश किया है। सरकार का कहना है कि पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा भारी संख्या में मुस्लिम समुदायों को ओबीसी सूची में शामिल करने का फैसला कानूनी रूप से बेहद कमजोर था। सरकार के मुताबिक, यह पूरा कदम केवल और केवल “वोट बैंक की राजनीति” से प्रेरित होकर उठाया गया था, जिसका कोई ठोस संवैधानिक आधार नहीं था। इसके साथ ही शुभेंदु सरकार ने कलकत्ता हाई कोर्ट द्वारा पूर्व में की गई उन तल्ख टिप्पणियों का भी विशेष रूप से हवाला दिया, जिनमें कई मुस्लिम समूहों को ओबीसी सूची में शामिल करने की प्रक्रिया को पूरी तरह से असंवैधानिक और नियमों के खिलाफ बताया गया था। सरकार का मानना है कि इस कदम से आरक्षण व्यवस्था में सुधार आएगा।

सरकारी संस्थानों में नई व्यवस्था तत्काल प्रभाव से हुई लागू

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार का यह नया फैसला केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे सरकारी नौकरियों और सभी शैक्षणिक संस्थानों में तुरंत प्रभाव से लागू कर दिया गया है। इस फैसले के सामने आते ही राज्य की राजनीति दो धड़ों में बंट गई है। विपक्ष ने इस नीति की चौतरफा और तीखी आलोचना शुरू कर दी है, और इसे समाज को बांटने वाला कदम बताया है। वहीं दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (BJP) और सत्ता पक्ष के नेता इस फैसले का पुरजोर समर्थन कर रहे हैं। भाजपा सरकार का कहना है कि यह कोई राजनीतिक कदम नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सुधार है जो लंबे समय से लंबित था और इससे केवल पात्र लोगों को ही उनका हक मिलेगा।

ममता बनर्जी का फैसला पलटकर 2010 वाला फॉर्मूला किया बहाल

गौरतलब है कि शुभेंदु सरकार ने राज्य में ओबीसी आरक्षण का पुराना यानी साल 2010 वाला फॉर्मूला फिर से बहाल कर दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कार्यकाल के दौरान जिन भी नई जातियों को ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) की आधिकारिक सूची में जोड़ा गया था, वर्तमान शुभेंदु सरकार ने उन सभी जातियों को आरक्षण की इस सूची से पूरी तरह बाहर का रास्ता दिखा दिया है। बाहर की गई इन जातियों में एक बहुत बड़ी संख्या मुस्लिम जातियों और उप-जातियों की थी, जिन्हें पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस सरकार के समय पिछड़ा मानकर आरक्षण के दायरे में लाया गया था। अब पुराने फॉर्मूले के लागू होने से बंगाल की पूरी आरक्षण व्यवस्था का ढांचा पूरी तरह बदल चुका है, जिस पर आने वाले दिनों में कानूनी और राजनीतिक लड़ाई तेज होने की पूरी संभावना है।

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