Whale Vomit : समुद्र की असीमित गहराइयां अपने भीतर न जाने कितने ही अनसुलझे रहस्य समेटे हुए हैं। इन्हीं रहस्यों में से एक है व्हेल मछली से निकलने वाला एक अत्यंत दुर्लभ और विचित्र पदार्थ, जिसे आम बोलचाल की भाषा में ‘व्हेल की उल्टी’ कहा जाता है। वैज्ञानिक जगत में इसे एम्बरग्रीस (Ambergris) के नाम से जाना जाता है। सुनने में भले ही यह किसी अपशिष्ट पदार्थ जैसा लगे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत सोने-चांदी से भी अधिक हो सकती है। यही कारण है कि इसे ‘तैरता हुआ सोना’ भी कहा जाता है।

कैसे होता है इस बेशकीमती एम्बरग्रीस का निर्माण?
एम्बरग्रीस का निर्माण विशेष रूप से स्पर्म व्हेल के पाचन तंत्र के भीतर होता है। स्पर्म व्हेल अक्सर गहरे समुद्र में रहने वाले जीवों, जैसे ‘स्क्विड’ (Squid) का शिकार करती है। स्क्विड की चोंच और उसके कुछ अन्य हिस्से बहुत कठोर होते हैं, जिन्हें पचाना व्हेल के लिए नामुमकिन होता है। व्हेल के पेट में मौजूद आंतें इन कठोर हिस्सों के चुभन से बचने के लिए एक विशेष प्रकार का चिकना और मोम जैसा पदार्थ स्रावित करती हैं। समय के साथ यह पदार्थ सख्त हो जाता है और व्हेल के शरीर से बाहर निकलकर समुद्र की लहरों पर तैरने लगता है।
‘तैरता सोना’ क्यों कहा जाता है इसे?
शुरुआत में जब एम्बरग्रीस व्हेल के शरीर से बाहर आता है, तो इसकी गंध बहुत तीखी और अप्रिय होती है। लेकिन कुदरत का करिश्मा देखिए, जैसे-जैसे यह पदार्थ सालों तक समुद्र के खारे पानी और सूरज की रोशनी के संपर्क में रहता है, इसके भीतर रासायनिक परिवर्तन होने लगते हैं। समय बीतने के साथ यह मोम जैसा ठोस पत्थर हल्का हो जाता है और इसमें से एक मीठी, सोंधी और मिट्टी जैसी अनूठी खुशबू आने लगती है। इसकी इसी दुर्लभता और खुशबू की वजह से इसे दुनिया के सबसे महंगे प्राकृतिक पदार्थों में गिना जाता है।
इत्र और लग्जरी परफ्यूम उद्योग में इसकी भारी मांग
एम्बरग्रीस की सबसे अधिक उपयोगिता वैश्विक इत्र (Perfume) उद्योग में है। यह एक बेहतरीन ‘फिक्सेटिव’ (Fixative) के रूप में कार्य करता है। इसका अर्थ यह है कि जब इसे परफ्यूम में मिलाया जाता है, तो यह खुशबू को वाष्पित होने से रोकता है और उसे त्वचा पर लंबे समय तक बनाए रखता है। दुनिया के सबसे बड़े और महंगे परफ्यूम ब्रांड आज भी असली एम्बरग्रीस की तलाश में रहते हैं। हालांकि, वर्तमान में विज्ञान ने इसके कृत्रिम विकल्प तैयार कर लिए हैं, लेकिन असली प्राकृतिक एम्बरग्रीस की गुणवत्ता और मांग आज भी बेजोड़ बनी हुई है।
कानूनी पेंच और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम
भले ही एम्बरग्रीस करोड़ों की संपत्ति हो, लेकिन इसका व्यापार करना जोखिम भरा और कई देशों में अवैध है। व्हेल एक संरक्षित जीव है, इसलिए उनके किसी भी अंग या अपशिष्ट के व्यापार पर कड़े प्रतिबंध हैं। भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत एम्बरग्रीस को रखना, खरीदना या बेचना एक गंभीर अपराध है। सरकार का मुख्य उद्देश्य व्हेल मछलियों को शिकारियों से बचाना और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखना है। कई बार लोग समुद्र तट पर मिलने वाले इस पदार्थ के लालच में कानूनी मुश्किलों में फंस जाते हैं।
प्रकृति का एक अनोखा और अनमोल उपहार
एम्बरग्रीस केवल एक जैविक प्रक्रिया का परिणाम नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, विज्ञान और अर्थशास्त्र के अद्भुत मेल का उदाहरण है। यह हमें याद दिलाता है कि समुद्र की गहराइयों में आज भी ऐसे कई अनमोल रत्न छिपे हैं, जिनका मूल्य इंसान की कल्पना से परे है। व्हेल की यह ‘उल्टी’ सदियों से इंसानों को अपनी ओर आकर्षित करती रही है, लेकिन इसकी सुरक्षा और संरक्षण आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। प्रकृति के इस अनमोल रहस्य को संजोए रखना ही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।


















