March Heatwave 2026: इस वर्ष उत्तर प्रदेश समेत उत्तर भारत के तमाम राज्यों में मौसम के उतार-चढ़ाव ने किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। फरवरी माह में कड़ाके की ठंड पड़ने के कारण किसानों को उम्मीद थी कि इस बार गेहूं और सरसों की पैदावार पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी। लेकिन मार्च की शुरुआत होते ही सूरज के तेवर अचानक तल्ख हो गए हैं। उत्तर भारत के कई इलाकों में पारा अभी से 35 डिग्री सेल्सियस के पार पहुँच चुका है। मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि आने वाले एक हफ्ते में तापमान में और भी इजाफा हो सकता है। यह अचानक बढ़ी गर्मी फसल के ‘गोल्डन पीरियड’ के लिए एक बड़ा खतरा बनकर उभरी है।
गेहूं की फसल पर ‘हीट स्ट्रेस’ का खतरा: क्यों जरूरी है मार्च का महीना?
गेहूं की फसल के लिए मार्च का समय सबसे महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इसी दौरान पौधों की बालियों में दाने भरने और दूध बनने की प्रक्रिया (Milking stage) चलती है। ऐसे नाजुक समय में तापमान का 35 डिग्री से ऊपर जाना पौधों के लिए ‘हीट स्ट्रेस’ यानी तापीय तनाव पैदा कर देता है। इस स्थिति में परागण की प्रक्रिया प्रभावित होती है, जिससे दाने पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते। गर्मी के कारण दाने समय से पहले सूखकर सिकुड़ जाते हैं और उनका वजन कम रह जाता है। इसका सीधा असर कुल पैदावार पर पड़ता है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
कृषि वैज्ञानिकों की राय: घबराएं नहीं, सावधानी से बचाएं अपनी फसल
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) पूसा के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. राजबीर सिंह के अनुसार, वर्तमान में 32 से 33 डिग्री सेल्सियस तापमान फसल के लिए बहुत घातक नहीं है, लेकिन सावधानी बरतनी जरूरी है। उन्होंने बताया कि जैसे ही पारा 35 डिग्री के स्तर को छूता है, दानों के पुष्ट होने की प्रक्रिया बाधित होने लगती है। पुष्ट दाना न बनने के कारण गेहूं की गुणवत्ता और मात्रा दोनों घट जाती है। वैज्ञानिकों का सुझाव है कि किसान इस समय फसल की निगरानी बढ़ा दें और मौसम के अनुसार सिंचाई का प्रबंधन करें।
फसल सुरक्षा के उपाय: नमी बनाए रखने के लिए शाम को करें हल्की सिंचाई
‘हीट स्ट्रेस’ से फसल को बचाने का सबसे प्रभावी तरीका खेत में नमी बरकरार रखना है। वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि किसान शाम के समय खेत में हल्की सिंचाई जरूर करें। शाम को पानी देने से मिट्टी रात भर ठंडी रहती है, जिससे फसल के आसपास का सूक्ष्म-तापमान (Micro-climate) कम बना रहता है। हालांकि, सिंचाई करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि हवा तेज न चल रही हो। तेज हवा में सिंचाई करने से खड़ी फसल के गिरने (Lodging) का खतरा रहता है, जो उत्पादन को भारी नुकसान पहुँचा सकता है।
सुरक्षा कवच और बीमारियों से बचाव: पोटाश और पीला रतुआ पर नजर
गर्मी से लड़ने के लिए विशेषज्ञ ‘म्यूरेट ऑफ पोटाश’ के छिड़काव की सिफारिश करते हैं। 250 ग्राम पोटाश को 125 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ स्प्रे करने से पौधों को लू और तेज धूप से लड़ने की शक्ति मिलती है। इसके अलावा, बढ़ते तापमान के साथ ‘पीला रतुआ’ (Yellow Rust) बीमारी का खतरा भी बढ़ जाता है। यदि गेहूं की पत्तियों पर हल्दी जैसा पाउडर दिखे, तो समझ लें कि संक्रमण हो चुका है। ऐसे लक्षण दिखने पर किसानों को तुरंत ‘प्रोपिकोनाज़ोल’ दवा का छिड़काव करना चाहिए ताकि संक्रमण को फैलने से रोका जा सके।
पुराने कड़वे अनुभव और आधुनिक तकनीक ‘जीरो टिलेज’ का महत्व
साल 2022 में अचानक आई लू के कारण पंजाब जैसे राज्यों में पैदावार में 13.5% की भारी गिरावट दर्ज की गई थी। उस कड़वे अनुभव से सीख लेते हुए विशेषज्ञों ने भविष्य के लिए ‘जीरो टिलेज’ (बिना जुताई की बुवाई) तकनीक अपनाने पर जोर दिया है। इस विधि में पिछली फसल के अवशेष मिट्टी पर एक प्राकृतिक चादर या ‘मल्चिंग’ का काम करते हैं। यह तकनीक जमीन के तापमान को 1 से 2 डिग्री तक कम रखती है और नमी को लंबे समय तक सहेज कर रखती है। इस नाजुक मोड़ पर जरा सी सतर्कता किसानों की साल भर की मेहनत को बचा सकती है।















