National Unity Day 2025:भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम राष्ट्रीय एकता, दृढ़ संकल्प और प्रशासनिक कुशलता का प्रतीक है। आजादी के बाद भारत की 562 रियासतों को एक धागे में पिरोने वाले इस महानायक का योगदान देश के निर्माण की बुनियाद है। लेकिन एक सवाल आज भी इतिहास के पन्नों में गूंजता है—जब कांग्रेस पार्टी में पटेल को भारी बहुमत का समर्थन था, तब वे भारत के पहले प्रधानमंत्री क्यों नहीं बने? और क्या वास्तव में महात्मा गांधी ने उन्हें यह पद संभालने से रोका था?
1975 में जब पटेल की जन्मशती आई, तब कांग्रेस की केंद्र और राज्य सरकारों ने उन्हें याद करने की औपचारिकता भी नहीं निभाई। विपरीत इसके, 1989 में पंडित नेहरू की जन्मशती पर देशभर में सरकारी कार्यक्रमों की धूम मच गई। टीवी सीरियल, डाक टिकट, सांस्कृतिक आयोजन और सरकारी मंचों पर नेहरू के यशोगान हुए। जबकि पटेल, जिन्होंने आधुनिक भारत की नींव रखी, उपेक्षा के धुंधलके में खो गए।
हालांकि, 150वें जन्मवर्ष पर तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। केंद्र से लेकर राज्यों तक भाजपा सरकारों ने सरदार पटेल की स्मृतियों को सजीव रखने का बड़ा अभियान चलाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए 2013 में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का निर्माण शुरू कराया और 2018 में इसे राष्ट्र को समर्पित किया—यह दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है, जो आज पटेल की एकता की भावना का प्रतीक बन चुकी है।
1946 में जब आजादी का सूरज उगने ही वाला था, तब कांग्रेस के भीतर अंतरिम सरकार के नेतृत्व को लेकर बड़ा फैसला होना था। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष ही अंतरिम सरकार का प्रमुख बनता था—यानी वही स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री बनने का स्वाभाविक दावेदार होता।
15 में से 12 राज्य कांग्रेस कमेटियों ने सरदार पटेल के नाम का प्रस्ताव रखा, दो ने कृपलानी को चुना और एक राज्य तटस्थ रहा। जवाहरलाल नेहरू का नाम किसी भी राज्य समिति से प्रस्तावित नहीं हुआ था। पर निर्णायक क्षण में महात्मा गांधी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया और पटेल को अपना नाम वापस लेने के लिए कहा।कृपलानी गांधी की चिट्ठी लेकर पटेल के पास पहुंचे, जिसमें लिखा था कि वे नेहरू के पक्ष में अपना नाम वापस ले लें। पटेल ने बिना कोई आपत्ति किए उस पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। गांधी की इच्छा उनके लिए आदेश थी। परिणामस्वरूप, नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने और स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री भी।
गांधी ने एक साल बाद अपने इस निर्णय की वजह सार्वजनिक की। उनके पौत्र राजमोहन गांधी ने अपनी पुस्तक “Patel: A Life” में गांधी को उद्धृत किया है:“जवाहरलाल का इस समय कोई दूसरा स्थान नहीं ले सकता। वे अंग्रेजों से संवाद करने में सक्षम हैं, हैरो और कैंब्रिज के शिक्षित हैं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हैं और मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से से भी उनका संवाद है।
जबकि पटेल व्यावहारिक नेता हैं लेकिन वैश्विक मंच पर नेहरू भारत की बेहतर भूमिका तय करेंगे।”गांधी का यह भी मानना था कि नेहरू “दूसरे स्थान” पर रहना स्वीकार नहीं करेंगे, जबकि पटेल विनम्रता से किसी भी भूमिका में देशहित में काम करते रहेंगे। गांधी ने कहा था“जवाहरलाल के चयन से देश पटेल की सेवाओं से वंचित नहीं होगा। ये दो बैल मिलकर भारत की गाड़ी खींचेंगे।”
गांधी की भविष्यवाणी कुछ हद तक सही भी साबित हुई, लेकिन मतभेद भी कभी दूर नहीं हुए। अंतरिम सरकार के दौरान नेहरू इस्तीफे की धमकियों के जरिये दबाव बनाते थे, जबकि पटेल इसे ‘राजनीतिक नाटक’ मानते थे। उन्होंने गांधी को लिखा—“जवाहरलाल के इन कदमों से वायसराय के सामने कांग्रेस की स्थिति कमजोर होती है।”आजादी के बाद सबसे बड़ा टकराव कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद जैसे रियासतों के विलय को लेकर हुआ। पटेल चाहते थे कि भारत की एकता में कोई बाधा न रहे, जबकि नेहरू अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया से चिंतित रहते थे।
जूनागढ़ में मुस्लिम नवाब द्वारा पाकिस्तान में विलय के फैसले के बाद पटेल ने त्वरित कार्रवाई की और जनमत संग्रह के बाद इसे भारत में मिला लिया।हैदराबाद में नेहरू की झिझक के बावजूद पटेल ने “ऑपरेशन पोलो” को मंजूरी दिलाई और रियासत को भारत में विलय कराया।कश्मीर के मुद्दे पर नेहरू की नीति से पटेल असहमत थे। पटेल चाहते थे कि कश्मीर का सवाल भारत की सुरक्षा से जोड़ा जाए, जबकि नेहरू इसे संयुक्त राष्ट्र में ले गए—एक निर्णय जिससे पटेल पूरी तरह असहमत थे।
गांधी की हत्या (30 जनवरी 1948) के बाद पटेल और नेहरू दोनों गहरे दुख में डूब गए। परंतु वैचारिक मतभेद जारी रहे। पटेल ने चीन की महत्वाकांक्षाओं को लेकर नेहरू को चेतावनी दी थी“चीन का विस्तार हमारे दरवाजे तक पहुंच चुका है। हमें सावधान रहना चाहिए।”नेहरू ने उनकी चेतावनी को नजरअंदाज किया और आने वाले वर्षों में चीन-भारत युद्ध (1962) ने पटेल की दूरदृष्टि को सही साबित कर दिया।1950 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में पटेल ने पुरुषोत्तम दास टंडन का समर्थन किया, जबकि नेहरू सी. राजगोपालाचारी के पक्ष में थे। जब टंडन जीते, तो नेहरू ने इस्तीफे की धमकी दी, पर बाद में वे पीछे हट गए।
15 दिसंबर 1950 को पटेल के निधन के बाद उन्हें धीरे-धीरे कांग्रेस और सरकारी मंचों से लगभग गायब कर दिया गया। राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी डायरी (13 मई 1959) में लिखा “आज का भारत सरदार पटेल की राजनीतिक दूरदृष्टि और प्रशासनिक क्षमता का परिणाम है, लेकिन हम उनके योगदान को भूलते जा रहे हैं।”पटेल की जन्मशती (1975) पर देश में इमरजेंसी लगी थी और उनकी स्मृति में कोई बड़ा आयोजन नहीं हुआ। इसके विपरीत, नेहरू की शताब्दी (1989) पर देशभर में सरकारी जश्न का माहौल था। इतिहासकार राजमोहन गांधी ने लिखा—“पटेल को हम तब याद करते हैं जब राजनीति को उनकी जरूरत महसूस होती है, अन्यथा उन्हें इतिहास के हाशिये पर छोड़ दिया गया है।”
जनसंघ और फिर भाजपा ने सरदार पटेल की विरासत को लगातार सम्मान दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2013 में “स्टैच्यू ऑफ यूनिटी” का शिलान्यास किया और 2018 में इसका लोकार्पण किया। आज यह प्रतिमा भारत की एकता और प्रशासनिक दृढ़ता का प्रतीक बन चुकी है।राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) द्वारा पटेल के जीवन पर आधारित 90 मिनट के नाटक का मंचन इस वर्ष केवड़िया में हो रहा है। इसके बाद यह नाटक दिल्ली, अहमदाबाद और अन्य शहरों में प्रस्तुत किया जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी स्वयं इस समारोह का उद्घाटन करेंगे।
सरदार वल्लभभाई पटेल को प्रधानमंत्री बनने से गांधी ने नहीं “रोका”, बल्कि उन्होंने उस समय देशहित में नेहरू को बेहतर विकल्प माना। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि कांग्रेस संगठन, जनता और इतिहास पटेल को सच्चे राष्ट्रनिर्माता के रूप में देखता है।उन्होंने सत्ता नहीं, सेवा को चुना। पद नहीं, देश की एकता को प्राथमिकता दी।आज राष्ट्रीय एकता दिवस पर देश जब लौह पुरुष को नमन करता है, तो यह केवल एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उस त्याग और नेतृत्व को स्मरण करने का अवसर है जिसने भारत को एक अटूट गणराज्य बनाया।
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