Digital World vs Offline Country : आज की भागदौड़ भरी दुनिया में जहाँ 5G और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) चर्चा का विषय हैं, वहीं पृथ्वी पर एक ऐसा कोना भी है जहाँ समय जैसे ठहर सा गया है। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ सुबह की शुरुआत स्मार्टफोन के नोटिफिकेशन से होती है और रात का अंत वेब सीरीज या सोशल मीडिया पर होता है। बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोरंजन—सब कुछ एक क्लिक पर निर्भर है। लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि इस आधुनिक दौर में भी एक पूरा राष्ट्र ऐसा है जिसके लिए ‘ऑनलाइन’ होना किसी विलासिता (Luxury) से कम नहीं है? यह देश है अफ्रीका का ‘इरिट्रिया’ (Eritrea), जो वैश्विक डिजिटल मानचित्र पर लगभग अदृश्य है।

इरिट्रिया: दुनिया का सबसे कम कनेक्टेड देश और इसकी भौगोलिक स्थिति
अफ्रीका के हॉर्न ऑफ अफ्रीका क्षेत्र में स्थित इरिट्रिया दुनिया के उन देशों की सूची में सबसे ऊपर आता है जहाँ इंटरनेट की पहुँच सबसे कम है। यहाँ की आबादी का एक बहुत ही नगण्य हिस्सा इंटरनेट का स्वाद चख पाया है। राजधानी अस्मारा जैसे बड़े शहरों को छोड़ दिया जाए, तो ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में डिजिटल कनेक्टिविटी का नामोनिशान तक नहीं है। यहाँ के नागरिकों के लिए इंटरनेट कोई रोजमर्रा की जरूरत नहीं, बल्कि एक ऐसी दुर्लभ सुविधा है जिसे हासिल करना बेहद चुनौतीपूर्ण और महंगा सौदा है।
सरकारी नियंत्रण: लोहे की दीवार जैसा डिजिटल सेंसरशिप
इरिट्रिया में इंटरनेट की कमी का सबसे बड़ा और प्राथमिक कारण वहां की सरकार का सख्त नियंत्रण है। यहाँ का पूरा दूरसंचार ढांचा सरकारी संस्थानों के अधीन है। सरकार केवल उन्हीं सूचनाओं को प्रसारित होने देती है जिन्हें वह उचित समझती है। हर ऑनलाइन गतिविधि पर कड़ी निगरानी रखी जाती है, जिसके कारण आम नागरिक इंटरनेट का उपयोग करने से कतराते हैं। यहाँ न तो निजी इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISP) काम कर सकते हैं और न ही लोगों को खुलकर अपनी बात ऑनलाइन रखने की आजादी है। यह सख्त सेंसरशिप देश को बाकी दुनिया से वैचारिक रूप से भी काट कर रखती है।
जर्जर बुनियादी ढांचा: तकनीकी पिछड़ेपन की मुख्य वजह
सेंसरशिप के अलावा, तकनीकी ढांचे या इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव भी एक बड़ी बाधा है। इरिट्रिया में ब्रॉडबैंड सेवाओं का विस्तार बेहद सीमित है। मोबाइल डेटा या 4G/5G जैसी तकनीकें यहाँ के लोगों के लिए विज्ञान कथा (Science Fiction) जैसी हैं। यहाँ उपलब्ध इंटरनेट की स्पीड इतनी धीमी है कि एक साधारण वेब पेज खुलने में भी मिनटों का समय लग जाता है। इसके साथ ही, इंटरनेट की कीमतें इतनी अधिक हैं कि एक औसत आय वाला व्यक्ति इसका खर्च वहन ही नहीं कर सकता। कमजोर बिजली आपूर्ति और तकनीकी उपकरणों की कमी ने इस समस्या को और भी जटिल बना दिया है।
डिजिटल गैप: आम जनता और तकनीक के बीच की गहरी खाई
इरिट्रिया की सड़कों पर आपको लोग स्मार्टफोन में डूबे हुए नहीं मिलेंगे। यहाँ इंटरनेट कैफे तो मौजूद हैं, लेकिन उनकी संख्या ऊँट के मुँह में जीरे के समान है। इन कैफे पर भी कड़े नियम लागू होते हैं और पहचान पत्र के बिना प्रवेश मिलना मुश्किल होता है। अधिकांश परिवारों के पास निजी कंप्यूटर या लैपटॉप नहीं हैं। यही कारण है कि यहाँ की जीवनशैली और वैश्विक डिजिटल संस्कृति के बीच एक विशाल खाई बन गई है। बच्चे आज भी केवल किताबों और रेडियो पर निर्भर हैं, जबकि दुनिया के अन्य हिस्सों में छात्र यूट्यूब और ई-लर्निंग ऐप्स से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
विकास पर प्रहार: शिक्षा और व्यापार की रुकी हुई रफ्तार
इंटरनेट का न होना केवल मनोरंजन की कमी नहीं है, बल्कि यह देश के आर्थिक और शैक्षणिक विकास के लिए एक बड़ा अवरोध है। आज के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में ‘ई-कॉमर्स’ और ‘डिजिटल पेमेंट’ अनिवार्य हो चुके हैं, लेकिन इरिट्रिया के व्यापारी इन सुविधाओं के अभाव में वैश्विक बाजार से नहीं जुड़ पाते। शोध कार्य करने वाले छात्रों के लिए नवीनतम जानकारियों तक पहुँचना नामुमकिन हो जाता है। जानकारी के आदान-प्रदान की धीमी गति ने देश को नवाचार (Innovation) के मामले में काफी पीछे धकेल दिया है।
वैश्विक डिजिटल दौड़ में पीछे छूटता एक राष्ट्र
जैसे-जैसे दुनिया ‘मेटावर्स’ और ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ (IoT) की ओर बढ़ रही है, इरिट्रिया का यह डिजिटल अलगाव चिंता का विषय है। यह देश आज ग्लोबल डिजिटल डिवाइड (Global Digital Divide) का सबसे ज्वलंत उदाहरण बन चुका है। बिना सूचना की स्वतंत्रता और तकनीकी विकास के, किसी भी देश का आधुनिक दौर में सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। जब तक यहाँ के इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार और नीतियों में लचीलापन नहीं आएगा, तब तक इरिट्रिया के लोग दुनिया की मुख्यधारा से कटे ही रहेंगे।
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