Yashwant Verma cash scandal
Yashwant Verma cash scandal: बहुचर्चित ‘कैश कांड’ में घिरे जस्टिस यशवंत वर्मा की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। देश की शीर्ष अदालत ने उन्हें किसी भी प्रकार की अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि जस्टिस वर्मा को लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित जांच समिति के समक्ष निर्धारित समय पर उपस्थित होना ही होगा। इस फैसले ने न्यायिक गलियारों और राजनीतिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है।
जस्टिस यशवंत वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर समिति के समक्ष पेश होने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की थी। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए आदेश दिया कि जस्टिस वर्मा को 12 जनवरी को हर हाल में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति के सामने हाजिर होना होगा। अदालत के इस फैसले के बाद अब जस्टिस वर्मा के पास पेशी के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है।
सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर भी सुनवाई की जिसमें तीन सदस्यीय जांच समिति के गठन की वैधता को चुनौती दी गई थी। लंबी बहस के बाद अदालत ने इस मुद्दे पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। हालांकि, जस्टिस वर्मा के लिए चिंता की बात यह रही कि फैसला सुरक्षित रखते हुए भी कोर्ट ने उन्हें कोई अंतरिम सुरक्षा या राहत प्रदान नहीं की। इसका अर्थ यह है कि जब तक अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक वर्तमान समिति की कार्यवाही जारी रहेगी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने समिति के गठन की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने लोकसभा महासचिव की रिपोर्ट का अवलोकन करते हुए कहा कि कुछ जानकारियां पहले से ही सार्वजनिक डोमेन में थीं, जिनकी पूर्व में आलोचना की जा चुकी है। पीठ ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “यह दुर्भावनापूर्ण मंशा का मामला भले न हो, लेकिन प्रथम दृष्टया यह ‘कानून में दुर्भावना’ (Malice in law) जैसा प्रतीत होता है।” कोर्ट ने संकेत दिया कि भविष्य में इस तरह की प्रक्रियाओं को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करने की आवश्यकता पड़ सकती है।
जस्टिस यशवंत वर्मा का मुख्य विरोध समिति के गठन के तरीके को लेकर है। उन्होंने दलील दी कि ‘जजेस (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968’ के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है। उनके वकील के अनुसार, यदि लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में महाभियोग का नोटिस दिया गया है, तो नियमतः लोकसभा अध्यक्ष को राज्यसभा के सभापति से परामर्श करना अनिवार्य है। याचिका में कानून की धारा 3(2) का हवाला देते हुए कहा गया कि ऐसी स्थिति में समिति का गठन दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए था।
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि लोकसभा अध्यक्ष ने अपने विशेषाधिकारों का उपयोग करते हुए यह कदम उठाया है और इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया प्रक्रियात्मक खामियां नजर आ रही हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये खामियां इतनी गंभीर हैं कि कोर्ट पूरे गठन को रद्द कर दे? इस संवैधानिक पहेली का समाधान अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले से ही होगा, जिस पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं।
Middle East Crisis: मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ईरान संकट ने…
MI vs KKR : इंडियन प्रीमियर लीग 2026 के रोमांचक मुकाबले में मुंबई इंडियंस (MI)…
Pratapgarh Press Club : उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में पत्रकारिता के क्षेत्र की अग्रणी…
Rajasthan Crime : राजस्थान के झुंझुनूं जिले से एक रूह कंपा देने वाली वारदात सामने…
IPL 2026: आईपीएल की तीन बार की विजेता कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) पिछले कुछ समय…
Tamil Nadu Election 2026 : तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के लिए सियासी पारा अपने चरम…
This website uses cookies.