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Yemen Unrest: ईरान के बाद अब यमन में भी भड़की विद्रोह की आग, 1990 के पहले वाले ‘आजाद देश’ की मांग को लेकर सड़कों पर लाखों!

Yemen Unrest: मध्य पूर्व के रणनीतिक देश यमन में अराजकता और हिंसा का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों की आग अब यमन तक पहुँच गई है, जहाँ हज़ारों लोग वर्तमान सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। विशेष रूप से दक्षिणी यमन के अदन शहर में स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण बनी हुई है। प्रदर्शनकारी 1990 से पहले के स्वतंत्र ‘दक्षिण यमन’ राज्य की बहाली की मांग कर रहे हैं। यह आंदोलन न केवल स्थानीय स्तर पर अस्थिरता पैदा कर रहा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त और सऊदी समर्थित सरकार के लिए भी बड़ी चुनौती बन गया है।

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साउदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (STC) और स्वतंत्रता का सपना

दक्षिणी यमन की स्वतंत्रता की इस पुकार का नेतृत्व ‘साउदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल’ (STC) कर रहा है। फ्रांस 24 की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह आंदोलन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार और स्थानीय अलगाववादी गुटों के बीच एक गहरी खाई पैदा कर रहा है। वर्ष 2017 में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के समर्थन से गठित एसटीसी लंबे समय से दक्षिण को एक अलग राष्ट्र बनाने की वकालत कर रहा है। अदन की गलियों में लोग दक्षिण यमन के पुराने झंडे लहराते हुए स्वतंत्रता के नारे लगा रहे हैं, जिससे यमन के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।

बुनियादी सुविधाओं का अभाव: बदहाल स्वास्थ्य और ठप अर्थव्यवस्था

यमन में यह विरोध प्रदर्शन केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा मानवीय संकट भी है। देश वर्तमान में गैस की भारी किल्लत, चरमराई स्वास्थ्य प्रणाली और पूरी तरह ठप हो चुकी अर्थव्यवस्था से जूझ रहा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि रसोई गैस की कमी के कारण घरों में चूल्हे ठप हैं और परिवहन व्यवस्था चरमरा गई है। अस्पतालों में जीवनरक्षक दवाइयों का अभाव है, जिससे आम जनता का जीवन नरक बन गया है। युद्ध और अस्थिरता ने लाखों लोगों को विस्थापित कर दिया है, जिससे यमन मानवीय त्रासदी के मुहाने पर खड़ा है।

1990 का एकीकरण और हाशिए पर जाता दक्षिणी समाज

यमन के इस संकट की जड़ें इतिहास में गहरी हैं। साल 1990 में उत्तर और दक्षिण यमन का एकीकरण हुआ था, लेकिन तब से ही दक्षिण के लोगों का मानना है कि उन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया है। उत्तर के हूती विद्रोहियों के साथ जारी युद्ध और सऊदी-यूएई गठबंधन के हस्तक्षेप ने स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है। दक्षिणी लोगों को लगता है कि उनकी पहचान और संसाधनों का शोषण किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप अलगाववाद की भावना प्रबल हुई है।

सैन्य संघर्ष और जनवरी 2026 का निर्णायक मोड़

साल 2025 और 2026 की शुरुआत में एसटीसी ने दक्षिणी क्षेत्रों पर पूर्ण सैन्य नियंत्रण हासिल करने की कोशिश की थी। हालांकि, जनवरी 2026 में सऊदी समर्थित सरकारी बलों ने एक बड़ा ‘काउंटरऑफेंसिव’ (जवाबी हमला) चलाया। इस सैन्य अभियान के बाद अदन सहित कई महत्वपूर्ण इलाकों पर सरकारी सेना ने फिर से कब्जा कर लिया। इसके परिणामस्वरूप एसटीसी के नेता एडरूस अल-जुबैदी को देश छोड़कर यूएई भागना पड़ा और काउंसिल ने औपचारिक रूप से खुद को भंग घोषित कर दिया। इसके बावजूद, आम जनता का गुस्सा शांत नहीं हुआ है और विरोध प्रदर्शन जारी हैं।

हिंसा की आग में जलता यमन और भविष्य की चुनौतियां

ताज़ा प्रदर्शनों के दौरान कई जगहों पर हिंसा भड़क उठी है, जिसमें एक व्यक्ति की मौत और दर्जनों के घायल होने की खबर है। सऊदी अरब और यूएई के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता और उत्तर में हूती विद्रोहियों के बढ़ते खतरे ने यमन को दो हिस्सों में बांट दिया है। जहाँ एक तरफ देश को एक रखने की कोशिशें की जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ दक्षिणी पहचान और स्वायत्तता की पुकार तेज़ होती जा रही है। क्या स्वतंत्र दक्षिण यमन का सपना कभी सच होगा या यह देश गृहयुद्ध की आग में पूरी तरह स्वाहा हो जाएगा, यह आने वाले समय के गर्भ में है।

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