Yogendra Yadav
Yogendra Yadav : स्वराज इंडिया के संस्थापक और प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने हालिया चुनावी परिणामों के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की कार्यशैली और विचारधारा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान समय में देश में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसे केवल चुनावी जीत-हार के नजरिए से देखना एक बड़ी भूल होगी। यादव के अनुसार, यह केवल एक राजनीतिक मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक “सभ्यतागत संघर्ष” (Civilizational Struggle) में तब्दील हो चुका है। उनका तर्क है कि आज की राजनीति का प्रभाव हमारे भविष्य की पीढ़ियों और देश की सांस्कृतिक विरासत पर पड़ने वाला है।
एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान योगेंद्र यादव ने मीडिया और विश्लेषकों द्वारा चुनाव परिणामों को पेश करने के तरीके की आलोचना की। उन्होंने कहा कि चुनाव परिणामों को टी-20 क्रिकेट मैच के स्कोरकार्ड की तरह देखना बंद करना चाहिए। उनके अनुसार, यह कोई मनोरंजन का खेल नहीं है जिसमें केवल हार और जीत मायने रखती हो। यादव ने जोर देकर कहा कि चुनावी सफलता केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे की विचारधारा देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को प्रभावित कर रही है। उन्होंने कहा कि जब हम केवल स्कोर देखते हैं, तो हम उस खतरे को भूल जाते हैं जो देश की अखंडता पर मंडरा रहा है।
पश्चिम बंगाल और असम में बीजेपी की भारी जीत का जिक्र करते हुए यादव ने कहा कि दांव पर केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं है। बंगाल में 207 सीटों के साथ बीजेपी की ऐतिहासिक जीत और असम में तीसरी बार राजग की सरकार बनना केवल सत्ता परिवर्तन नहीं है। यादव ने चेतावनी दी कि जिस तरह से राजनीति का ध्रुवीकरण हो रहा है, उससे देश का ‘स्वधर्म’ और बुनियादी नींव खतरे में पड़ गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी और आरएसएस का एजेंडा केवल कांग्रेस को हराना नहीं है, बल्कि उस विचारधारा को खत्म करना है जिस पर इस राष्ट्र का निर्माण हुआ है।
योगेंद्र यादव ने अपने संबोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा सत्ता पक्ष देश की दीर्घकालिक सभ्यतागत भावना पर प्रहार कर रहा है। उनके अनुसार, विविधता में एकता के भारतीय सिद्धांत को बदलकर एक विशेष सांचे में ढालने की कोशिश की जा रही है। यादव ने तर्क दिया कि यह हमला केवल राजनीतिक विरोधियों पर नहीं है, बल्कि यह उस ज़मीन की रूह पर है जिसने सदियों से विभिन्न संस्कृतियों को एक साथ पिरोया है। यदि इस दिशा को नहीं बदला गया, तो आने वाले समय में देश के इतिहास को फिर से लिखने की कोशिशें और तेज होंगी।
बंगाल और असम के परिणामों से जो लोग निराश हैं, उन्हें संबोधित करते हुए योगेंद्र यादव ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि निराशा में आकर राजनीति से मुंह मोड़ लेना सबसे बड़ी गलती होगी। यदि जागरूक और प्रगतिशील लोग मैदान छोड़ देंगे, तो “विभाजनकारी ताकतों” के लिए रास्ता पूरी तरह साफ हो जाएगा। उन्होंने लोगों को आगाह किया कि लोकतंत्र में तटस्थ रहना संभव नहीं है। यदि आप राजनीति में रुचि नहीं लेंगे, तो राजनीति आपकी नियति तय करेगी। इसलिए, सक्रिय भागीदारी ही एकमात्र रास्ता है।
अंत में, यादव ने स्पष्ट किया कि राजनीति में शामिल होने का मतलब केवल चुनाव लड़ना या किसी दल का झंडा उठाना नहीं है। उन्होंने बौद्धिक सहभागिता, सांस्कृतिक जुड़ाव और रचनात्मक कार्यों के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब समाज पर संकट के बादल छाए हैं, तभी परिवर्तनकारी विचारों ने जन्म लिया है। उन्होंने युवाओं और बुद्धिजीवियों से अपील की कि वे वैचारिक स्तर पर इस संघर्ष का हिस्सा बनें और देश के बुनियादी सिद्धांतों की रक्षा के लिए निरंतर कार्य करते रहें।
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