Dinesh Mahant Thakordas
Dinesh Mahant Thakordas : कहते हैं कि उम्र केवल एक संख्या होती है, और इस बात को अहमदाबाद के 66 वर्षीय दिनेश महंत ठाकोरदास ने पूरी तरह सच साबित कर दिया है। जहाँ अधिकांश लोग 60 की उम्र पार करने के बाद एक आरामदायक कुर्सी, अखबार और शांतिपूर्ण रिटायरमेंट की कल्पना करते हैं, वहीं दिनेश जी ने सड़कों पर उतरकर एक नई चुनौती को गले लगाया है। उन्होंने रिटायरमेंट के बाद घर पर खाली बैठने के बजाय ‘ब्लिंकिट’ (Blinkit) में डिलीवरी पार्टनर के रूप में अपनी दूसरी पारी की शुरुआत की है। उनकी यह कहानी न केवल सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोर रही है, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए एक मिसाल पेश कर रही है जो मानता है कि एक उम्र के बाद सीखने या काम करने की गुंजाइश खत्म हो जाती है।
दिनेश महंत ठाकोरदास का जीवन संघर्ष और अनुशासन की एक लंबी दास्तान रहा है। उन्होंने एक प्रतिष्ठित लाइफ इंश्योरेंस कंपनी में लगभग 26 वर्षों तक क्लर्क के पद पर अपनी सेवाएं दीं। अपनी दशकों की मेहनत से उन्होंने न केवल अपना घर चलाया, बल्कि अपने तीनों बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाकर उन्हें समाज में अच्छी तरह स्थापित भी किया। आज उनके बच्चे अपने-अपने क्षेत्रों में सफल हैं और दिनेश जी पर अब कोई बड़ी आर्थिक जिम्मेदारी या कर्ज नहीं है। तकनीकी रूप से वह एक सुकून भरी सेवानिवृत्ति के हकदार थे, लेकिन उनके भीतर के ‘एक्टिव’ इंसान ने उन्हें कुछ अलग करने के लिए प्रेरित किया।
रिटायरमेंट के बाद जब वह अपने इलाके में समय बिता रहे थे, तो उनकी नजर अक्सर तेजी से सामान पहुँचाने वाले डिलीवरी बॉयज पर पड़ती थी। उनके मन में जिज्ञासा जगी कि आखिर यह पूरा सिस्टम काम कैसे करता है। उन्होंने देखा कि युवा लड़के ऐप के जरिए ऑर्डर लेते हैं और लोगों के घरों तक खुशियां पहुँचाते हैं। इसी जिज्ञासा ने उन्हें ‘ब्लिंकिट’ से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। जो काम शुरुआत में केवल समय बिताने या अनुभव लेने के लिए शुरू हुआ था, वह देखते ही देखते एक जुनून में बदल गया। पिछले 2 वर्षों के छोटे से अंतराल में, दिनेश जी ने 10,220 से अधिक डिलीवरी पूरी करने का कीर्तिमान स्थापित किया है, जो कई युवाओं के लिए भी एक कठिन लक्ष्य हो सकता है।
दिनेश जी की कार्यक्षमता का राज उनके कड़े अनुशासन में छिपा है। वह आज भी किसी नौजवान की तरह ऊर्जा से भरे हुए हैं। उनका दैनिक रूटीन सुबह 5 बजे शुरू हो जाता है। तैयार होने के बाद, वह ठीक 6 बजे अपने नजदीकी ‘डार्क स्टोर’ (Blinkit Warehouse) पहुँच जाते हैं। सुबह 11:30 बजे तक वह निरंतर ऑर्डर्स की डिलीवरी करते हैं। इसके बाद का समय वह अपनी इच्छा पर छोड़ देते हैं—यदि मन हुआ तो काम जारी रखते हैं, अन्यथा घर जाकर आराम करते हैं। यह ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ उन्हें मानसिक शांति और शारीरिक स्फूर्ति दोनों प्रदान करता है।
आमतौर पर लोग आर्थिक तंगी के कारण इस उम्र में काम करते हैं, लेकिन दिनेश जी की कहानी यहाँ भी अलग है। वह डिलीवरी से होने वाली अपनी आय का एक भी रुपया घर के राशन या बिजली के बिल पर खर्च नहीं करते। इसके बजाय, वह इस पैसे को अपनी ‘ट्रैवल बकेट लिस्ट’ पूरी करने के लिए बचाते हैं। दिनेश जी को घूमने-फिरने का बेहद शौक है। वह इस कमाई से भारत के विभिन्न राज्यों और यहाँ तक कि विदेशों की यात्राएं भी करते हैं। उनका मानना है कि यात्रा करना और नए लोगों से मिलना ही जीवन का असली अनुभव है। उनके लिए डिलीवरी पार्टनर का काम केवल पैसा कमाने का जरिया नहीं, बल्कि उनकी वैश्विक यात्राओं को स्पॉन्सर करने वाला एक ‘फंड’ है।
जब से दिनेश जी की कहानी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल हुई है, इंटरनेट यूजर्स के बीच एक बड़ी बहस छिड़ गई है। उनकी कहानी को हजारों बार शेयर किया गया है और कमेंट्स की बाढ़ आ गई है। लोगों की प्रतिक्रियाओं को मुख्य रूप से दो वर्गों में बांटा जा सकता है। जहाँ एक तरफ लोग उनकी सराहना कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इस उम्र में होने वाले शारीरिक श्रम को लेकर चिंतित भी हैं।
सोशल मीडिया पर एक बड़ा वर्ग दिनेश जी को ‘असली हीरो’ मान रहा है। कई यूजर्स ने लिखा कि दिनेश जी ने यह साबित कर दिया है कि मेहनत करने की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। कुछ लोगों ने उनके अनुशासन की तुलना आज की युवा पीढ़ी (Gen Z) से की, जो अक्सर काम के दबाव में जल्दी हार मान लेती है। कमेंट्स में लोगों ने उनकी एक्टिव लाइफस्टाइल को सराहा और कहा कि इस उम्र में घर बैठने से बेहतर है कि शरीर को सक्रिय रखा जाए ताकि बीमारियां पास न फटकें।
वहीं, प्रतिक्रियाओं का दूसरा पहलू थोड़ा चिंताजनक था। कुछ यूजर्स का मानना है कि 66 साल की उम्र में भारी बैग लेकर सीढ़ियां चढ़ना या धूप-बारिश में बाइक चलाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। उनके अनुसार, लंबे समय तक ऐसा शारीरिक श्रम भविष्य में जोड़ों के दर्द या हृदय संबंधी समस्याओं को जन्म दे सकता है। कुछ लोगों ने यह भी तर्क दिया कि इस उम्र के लोगों को शारीरिक श्रम के बजाय मानसिक रूप से सक्रिय रहने वाले कामों में समय बिताना चाहिए।
दिनेश जी की कहानी ने पीढ़ियों के बीच के अंतर (Generation Gap) को भी स्पष्ट रूप से उजागर किया है। वह ‘Gen X’ (जेनरेशन एक्स) की उस कार्यसंस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं जहाँ काम को पूजा माना जाता था और अनुशासन जीवन का आधार था। उनकी तुलना में आज के दौर में ‘क्वाइट क्विटिंग’ और ‘बर्नआउट’ जैसे शब्द आम हो गए हैं। दिनेश जी बिना किसी शिकायत के हर मौसम में अपना काम पूरा करते हैं, जो उनके पेशेवर रवैये को दर्शाता है।
दिनेश महंत ठाकोरदास की कहानी केवल एक डिलीवरी पार्टनर की कहानी नहीं है, बल्कि यह बदलते भारत की एक नई तस्वीर है। यह हमें सिखाती है कि रिटायरमेंट का मतलब जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। चाहे उद्देश्य पैसा कमाना हो, समय बिताना हो या दुनिया घूमना—महत्वपूर्ण यह है कि आप सक्रिय रहें। दिनेश जी आज अहमदाबाद की सड़कों पर केवल सामान ही नहीं पहुँचा रहे, बल्कि वह हर उस बुजुर्ग को एक संदेश दे रहे हैं जो समाज के बनाए ‘रिटायरमेंट के नियमों’ में खुद को कैद महसूस करता है। उनकी हिम्मत और जज्बा वाकई काबिले तारीफ है।
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