India Health Report : भारत में लंबी उम्र को लेकर आमतौर पर गांवों की साफ हवा, शुद्ध पानी और सादे खानपान को बेहतर माना जाता है। वहीं, शहरों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और बेहतर अस्पतालों को लंबी जिंदगी का आधार समझा जाता है। लेकिन आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। भारत में शहरों में जन्म लेने वाले बच्चों की औसत जीवन प्रत्याशा ग्रामीण क्षेत्रों में पैदा होने वाले बच्चों से करीब तीन साल अधिक है। यानी लंबी जिंदगी के मामले में शहर आगे दिखाई देते हैं।
डेटा फॉर इंडिया की लाइफ एक्सपेक्टेंसी से जुड़ी रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में औसत जीवन प्रत्याशा में पिछले सात दशकों के दौरान उल्लेखनीय सुधार हुआ है। वर्ष 1950 में भारत में जन्म लेने वाले बच्चे की अनुमानित उम्र करीब 41 साल थी। वर्ष 2024 तक यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 72 साल पहुंच गया। यह बदलाव स्वास्थ्य सेवाओं, चिकित्सा सुविधाओं और जीवन स्तर में आए सुधार को दर्शाता है।

गांव और शहर के बीच तीन साल का अंतर
रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक, शहरी क्षेत्रों में पैदा होने वाले बच्चों की जीवन प्रत्याशा ग्रामीण बच्चों की तुलना में लगभग तीन साल ज्यादा है। इसके पीछे शहरों में उपलब्ध बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की अहम भूमिका मानी जाती है। बड़े अस्पताल, विशेषज्ञ डॉक्टर, आधुनिक जांच केंद्र और गंभीर बीमारियों के इलाज की सुविधाएं शहरों में अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध होती हैं।

बीमारियों की समय पर पहचान और उचित उपचार से मरीजों के बचने की संभावना बढ़ती है। इसके अलावा शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता, शिक्षा और चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच भी जीवन प्रत्याशा को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि गांवों में रहने वाले सभी लोगों की स्थिति एक जैसी है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी सुविधाओं और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता अलग-अलग हो सकती है।
केरल और छत्तीसगढ़ के बीच करीब 10 साल का अंतर
भारत के अलग-अलग राज्यों में भी जीवन प्रत्याशा को लेकर बड़ा अंतर देखने को मिलता है। रिपोर्ट के मुताबिक, केरल में जन्म लेने वाले बच्चे की अनुमानित उम्र छत्तीसगढ़ में पैदा होने वाले बच्चे से करीब 10 साल अधिक हो सकती है। यह अंतर राज्यों के सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी हालात की ओर ध्यान दिलाता है।

केरल में शिक्षा का बेहतर स्तर, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता जैसे कारक सकारात्मक भूमिका निभाते हैं। दूसरी ओर, कई राज्यों में गरीबी, कुपोषण, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और दूरदराज के इलाकों में इलाज तक पहुंच जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। इन परिस्थितियों का असर लोगों की औसत उम्र पर पड़ सकता है।
सात दशकों में 41 से 72 साल तक पहुंची उम्र
भारत में जीवन प्रत्याशा का आंकड़ा आजादी के बाद से लगातार बेहतर हुआ है। वर्ष 1950 में जहां नवजात बच्चे की अनुमानित उम्र करीब 41 साल थी, वहीं 2024 में यह लगभग 72 साल हो गई। अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार, टीकाकरण अभियान तथा संक्रामक बीमारियों पर नियंत्रण इस सुधार के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
कोरोना महामारी के दौरान भारत सहित दुनिया के कई देशों में जीवन प्रत्याशा प्रभावित हुई थी। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार, भारत का यह आंकड़ा 2022 तक महामारी से पहले के स्तर पर लौट आया और इसके बाद फिर बढ़ने लगा। इससे स्वास्थ्य व्यवस्था में हुए सुधार और महामारी के बाद की स्थिति का संकेत मिलता है।
महिलाओं की जीवन प्रत्याशा पुरुषों से अधिक
रिपोर्ट में महिलाओं और पुरुषों की औसत उम्र के बीच अंतर भी सामने आया है। भारत में 1950 के दशक में पुरुषों की जीवन प्रत्याशा महिलाओं से अधिक थी, लेकिन 1980 के शुरुआती वर्षों में यह स्थिति बदल गई। अब महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक लंबा जीवन जीने की उम्मीद रखती हैं।
वर्ष 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में जन्म लेने वाली बच्चियों की अनुमानित जीवन प्रत्याशा लड़कों से तीन साल से ज्यादा अधिक है। इसके पीछे जैविक कारणों के साथ जीवनशैली और मृत्यु के जोखिम से जुड़े कारक भी हो सकते हैं। पुरुषों में दुर्घटनाओं से मृत्यु का खतरा अधिक देखा जाता है। वहीं, कुछ गंभीर बीमारियों के कारण भी उनकी मृत्यु का जोखिम बढ़ सकता है।
लंबी उम्र के मामले में सुविधाओं की अहम भूमिका
कुल मिलाकर, भारत में औसत जीवन प्रत्याशा बढ़ने के बावजूद गांवों, शहरों और राज्यों के बीच अंतर बना हुआ है। बेहतर अस्पताल, शिक्षा, पोषण और समय पर इलाज लोगों की जिंदगी को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक हैं। आंकड़े यह भी बताते हैं कि लंबी उम्र केवल खानपान या वातावरण पर निर्भर नहीं करती, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की भी इसमें अहम भूमिका होती है।
Read More : SIR 2026 : SIR में कटे नामों पर चुनाव आयोग का बड़ा फैसला, सात राज्यों के मतदाताओं को फिर मिलेगा मौका?

