Neelkanth Bird : भारत में कई ऐसे पक्षी हैं, जिनका संबंध प्रकृति के साथ-साथ धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ा हुआ है। इन्हीं में से एक है नीलकंठ पक्षी, जिसे भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि दशहरे के दिन इस पक्षी के दर्शन करना बेहद शुभ होता है। बुंदेलखंड में तो इसे कभी भी देखना सौभाग्य और मनोकामना पूरी होने का संकेत माना जाता है। हालांकि, बदलते पर्यावरण और घटती आबादी के कारण अब इस खूबसूरत पक्षी को देखना पहले की तुलना में मुश्किल होता जा रहा है।
बुंदेलखंड में नीलकंठ को लेकर सदियों पुरानी कहावत
बुंदेलखंड में नीलकंठ पक्षी को लेकर एक लोकप्रिय कहावत प्रचलित है, ‘नीलकंठ तुम नीले रहियो, दूध भात खा कर जइयो, हमाई बात भगवान तक पहुंचाइयो।’ स्थानीय मान्यता के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति नीलकंठ को देखकर मन ही मन अपनी इच्छा व्यक्त करता है या प्रार्थना करता है, तो उसकी मनोकामना पूरी हो सकती है। यही वजह है कि इस पक्षी के दिखाई देने पर लोग इसे शुभ संकेत मानकर भगवान से अपनी इच्छाएं पूरी होने की कामना करते हैं।

नीला कंठ नहीं, फिर भी क्यों कहलाता है नीलकंठ?
नीलकंठ पक्षी की सबसे दिलचस्प विशेषता इसका नाम है। दरअसल, इसका गला यानी कंठ नीला नहीं होता, लेकिन इसके पंखों पर बेहद आकर्षक नीला रंग दिखाई देता है। जब यह पक्षी उड़ान भरते हुए अपने पंख फैलाता है, तब नीले रंग की खूबसूरती देखते ही बनती है। धार्मिक मान्यताओं में इसके नीले रंग को भगवान शिव से जोड़ा जाता है। समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया था, जिसके कारण उनका गला नीला पड़ गया था। इसी मान्यता के आधार पर इस पक्षी का नाम नीलकंठ पड़ा।

भारत के अलावा कई देशों में भी पाया जाता है यह पक्षी
नीलकंठ को अंग्रेजी में इंडियन रोलर कहा जाता है। यह भारत के अलावा एशिया के कई अन्य क्षेत्रों में भी पाया जाता है। इसकी एक रिश्तेदार प्रजाति यूरोपियन रोलर मध्य एशिया, मिडिल ईस्ट और मोरक्को जैसे क्षेत्रों में मिलती है। मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में अच्छी जलवायु और जैव विविधता के कारण 300 से अधिक प्रजातियों के पक्षी पाए जाते हैं। नीलकंठ भी यहां झीलों, घने जंगलों और खेतों के आसपास दिखाई देता है।
किसानों के लिए किसी प्राकृतिक रक्षक से कम नहीं नीलकंठ
नीलकंठ पक्षी को किसानों का मित्र भी कहा जाता है। इसकी भोजन संबंधी आदतें खेती के लिए काफी फायदेमंद होती हैं। यह झींगुर, कीड़े-मकोड़े और फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले दूसरे छोटे जीवों को खाता है। इसके अलावा छोटे सांपों को भी अपना भोजन बनाता है। खेतों के आसपास इसकी मौजूदगी से फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों की संख्या नियंत्रित करने में मदद मिलती है। इस तरह यह प्राकृतिक रूप से खेती और पर्यावरण के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

वन विभाग के अधिकारी ने बताई नीलकंठ की खासियत
सागर स्थित वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर रजनीश सिंह के मुताबिक, नीलकंठ बेहद खूबसूरत पक्षी है और इसका धार्मिक महत्व भी काफी पुराना है। उन्होंने बताया कि भले ही इसका कंठ नीला नहीं होता, लेकिन पंखों पर दिखाई देने वाला आकर्षक नीला रंग इसे विशेष पहचान देता है। यह पक्षी खेतों में मौजूद हानिकारक कीड़ों को खाकर किसानों के लिए भी मददगार साबित होता है।
दशहरे पर नीलकंठ के दर्शन से जुड़ी है भगवान राम की कहानी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दशहरे के दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना धन, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। प्रचलित कथा के मुताबिक, भगवान राम ने रावण का वध करने से पहले नीलकंठ पक्षी के दर्शन किए थे। इसी वजह से विजयादशमी के अवसर पर इस पक्षी को देखना शुभ माना जाने लगा। हालांकि, अब इसकी घटती संख्या चिंता का विषय बन रही है। ऐसे में धार्मिक महत्व के साथ-साथ इस खूबसूरत पक्षी और इसके प्राकृतिक आवास को बचाना भी बेहद जरूरी है।
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