Deep State India : भारतीय राजनीति में सरकार विरोधी आंदोलनों को विदेशी साजिश और बाहरी फंडिंग से जोड़ने की बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इस मुद्दे पर गुजरात के 1974 के नव निर्माण आंदोलन का उदाहरण देते हुए मौजूदा राजनीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं। उस समय छात्र आंदोलन ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार की नींव हिला दी थी। खास बात यह है कि इसी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले नरेंद्र मोदी आगे चलकर गुजरात के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री बने।
मेस फीस बढ़ोतरी से शुरू हुआ था गुजरात का ऐतिहासिक आंदोलन
सत्तर के दशक की शुरुआत में गुजरात में कांग्रेस का राजनीतिक दबदबा था। जुलाई 1973 में पार्टी के अंदरूनी विवाद के बाद घनश्याम ओझा की जगह चिमनभाई पटेल मुख्यमंत्री बने। दिसंबर 1973 में मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने मेस की फीस में 20 प्रतिशत बढ़ोतरी के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। धीरे-धीरे यह विरोध दूसरे कॉलेजों और गुजरात विश्वविद्यालय तक पहुंच गया। महंगाई, खाद्य संकट और भ्रष्टाचार के आरोपों ने आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाया।

चिमनभाई पटेल को देना पड़ा था मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा
छात्रों ने नव निर्माण युवा समिति बनाकर आंदोलन को संगठित किया। देखते ही देखते शिक्षक, मजदूर और मध्यम वर्ग भी सड़कों पर उतर आए। बंद, प्रदर्शन और हिंसक झड़पों के बीच राजनीतिक दबाव बढ़ता गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी चिमनभाई पटेल को पद छोड़ने के लिए कहा। आखिरकार 9 फरवरी 1974 को उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। बाद में विधानसभा भंग कर राष्ट्रपति शासन लागू किया गया।

आंदोलन से नरेंद्र मोदी को मिली राजनीतिक पहचान
इस आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में नरेंद्र मोदी ने भी हिस्सा लिया था। वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यों के साथ समन्वय, प्रचार सामग्री तैयार करने और संगठनात्मक गतिविधियों में शामिल रहे। बाद में जयप्रकाश नारायण के गुजरात दौरे के दौरान भी उनकी मुलाकात हुई। आपातकाल के दौरान भूमिगत रहकर संगठनात्मक गतिविधियां संचालित करने में भी उनकी भूमिका बताई जाती है। यही युवा आगे चलकर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री और 2014 में प्रधानमंत्री बने।
आज विरोध प्रदर्शनों को Deep State से जोड़ने पर सवाल
लेख में मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि आज सरकार विरोधी आंदोलनों को विदेशी फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय साजिश से जोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और RSS प्रमुख मोहन भागवत के बयानों के संदर्भ में यह बहस उठाई गई है। आरोप है कि युवाओं और विपक्ष के विरोध को वास्तविक समस्याओं के बजाय बाहरी ताकतों का प्रभाव बताकर खारिज किया जाता है।

शाहीनबाग से किसान आंदोलन तक लगाए गए आरोप
CAA विरोधी शाहीनबाग और जामिया आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों को टुकड़े-टुकड़े गैंग और पाकिस्तान समर्थक बताने के आरोप लगे। किसान आंदोलन के समय प्रदर्शनकारियों को खालिस्तानी कहे जाने और विदेशी फंडिंग के दावे भी सामने आए। पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग के टूलकिट साझा करने के बाद दिशा रवि की गिरफ्तारी ने भी विवाद खड़ा किया। हाल के वर्षों में NEET और दूसरी परीक्षाओं में अनियमितताओं के खिलाफ युवाओं के प्रदर्शन को लेकर भी राजनीतिक बयानबाजी हुई है।
भारत के कई बड़े सुधार आंदोलनों से निकले
इतिहास में कई जन आंदोलनों ने देश की नीतियों और कानूनों को प्रभावित किया है। तमिलनाडु का हिंदी विरोधी आंदोलन, 2012 का निर्भया आंदोलन और सूचना का अधिकार तथा खाद्य सुरक्षा कानूनों के लिए नागरिक समाज का संघर्ष इसके उदाहरण हैं। इन आंदोलनों ने सरकारों पर दबाव बनाया और लोकतांत्रिक सुधारों का रास्ता खोला।
लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना नागरिकों का अधिकार
लेख का मुख्य तर्क है कि लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं है। बेरोजगार युवाओं, किसानों, आदिवासियों और विपक्षी दलों को अपनी मांगें उठाने तथा सरकार की नीतियों पर सवाल करने का अधिकार है। हर विरोध को देशविरोधी या विदेशी साजिश बताना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
विदेशी साजिश के आरोपों के साथ सबूत भी जरूरी
यदि किसी आंदोलन में अवैध विदेशी फंडिंग हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन बिना ठोस सबूत के प्रदर्शनकारियों को अपराधी ठहराना उचित नहीं है। सरकार को विदेशी दुश्मन तलाशने के बजाय युवाओं की बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक असंतोष जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती नागरिकों की आवाज सुनने और उनके सवालों का जवाब देने में ही है।

