Quetta blast : पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी क्वेटा मंगलवार रात एक बार फिर आतंक की चपेट में आ गई। बलूच नेशनल पार्टी (बीएनपी-एम) की एक रैली के ठीक बाद शाहवानी स्टेडियम के बाहर हुए आत्मघाती विस्फोट में कम से कम 14 लोगों की मौत हो गई, जबकि 30 से ज्यादा घायल हो गए हैं। घायलों में पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद अहमद नवाज तथा नेता मूसा बलूच भी शामिल हैं।

मेंगल की पुण्यतिथि पर आयोजित की गई थी रैली
यह रैली बलूचिस्तान के पूर्व मुख्यमंत्री सरदार अताउल्लाह मेंगल की चौथी पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित की गई थी। रैली में हजारों की संख्या में लोग मौजूद थे। कार्यक्रम संपन्न होने के बाद जैसे ही लोग लौटने लगे, स्टेडियम की पार्किंग में तेज धमाका हुआ।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि पास में खड़ी कई गाड़ियां पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं और आसपास के इलाकों में अफरा-तफरी मच गई।
आत्मघाती हमलावर की पहचान और तरीका
अब तक मिली जानकारी के अनुसार, हमलावर एक बिना दाढ़ी वाला व्यक्ति था, जिसकी उम्र करीब 35 से 40 वर्ष के बीच बताई जा रही है। उसके पास करीब 8 किलो विस्फोटक था, जिसमें बॉल बेयरिंग भी भरे हुए थे। यह हमला मार्च 2025 में मस्तुंग के लाक दर्रे में हुए आत्मघाती हमले से मिलता-जुलता था।
चश्मदीदों का कहना है कि हमलावर ने बीएनपी नेता मेंगल के जाने का इंतजार किया, ताकि प्रमुख नेताओं को निशाना बनाया जा सके। लेकिन मेंगल के रवाना होते ही उसने खुद को उड़ा लिया।
किसी संगठन ने नहीं ली जिम्मेदारी
अब तक किसी आतंकी संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है। हालांकि, इस तरह के हमलों में अक्सर तेहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) या अन्य कट्टरपंथी समूहों की भूमिका सामने आती रही है। सुरक्षा एजेंसियां मौके पर पहुंच चुकी हैं और फॉरेंसिक जांच जारी है।
पृष्ठभूमि में पुरानी साजिशें?
मार्च 2025 में भी बीएनपी-एम के नेताओं पर आत्मघाती हमला किया गया था, जब वे मस्तुंग जिले के लाकपास क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। उस समय सुरक्षा बलों की सतर्कता के चलते बड़ा नुकसान टल गया था। अब एक बार फिर से बीएनपी-एम नेताओं को निशाना बनाए जाने से यह संदेह गहराता है कि यह कोई पूर्व नियोजित साजिश हो सकती है।
क्वेटा में हुआ यह आत्मघाती हमला एक बार फिर इस बात की याद दिलाता है कि बलूचिस्तान प्रांत अभी भी चरमपंथी हमलों के साए में है। बीएनपी-एम जैसे राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को बार-बार निशाना बनाया जाना लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।










