Karnataka vs Governor: कर्नाटक सरकार का सुप्रीम कोर्ट में बड़ा बयान, राष्ट्रपति और राज्यपाल सिर्फ ‘नाममात्र’ के प्रमुख

Karnataka vs Governor: सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के 14 सवालों के संदर्भ में सुनवाई के दौरान कर्नाटक सरकार ने बड़ा संवैधानिक बयान दिया। कांग्रेस शासित राज्य ने कहा कि भारत के संविधान के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल सिर्फ नाममात्र के प्रमुख हैं और वे केवल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य हैं। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब संविधान पीठ यह विचार कर रही है कि क्या अदालतें राज्यपाल और राष्ट्रपति को किसी विधेयक (बिल) पर निर्णय लेने की समय-सीमा निर्धारित कर सकती हैं। क्या है मामला? सुप्रीम कोर्ट की 5-जजों की संविधान पीठ, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई कर रहे हैं, राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए 14 संवैधानिक सवालों की जांच कर रही है। इनमें प्रमुख सवाल यह है कि क्या राज्यपाल और राष्ट्रपति को विधानसभा में पारित बिलों पर विचार करने के लिए एक निर्धारित समयसीमा के भीतर निर्णय लेना चाहिए? कर्नाटक सरकार की दलील कर्नाटक सरकार की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रमण्यम ने बेंच को बताया कि “संवैधानिक ढांचे में, राष्ट्रपति और राज्यपाल कार्यपालिका प्रमुख जरूर हैं, लेकिन वे स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं ले सकते। उनकी संतुष्टि का मतलब वास्तव में मंत्रिपरिषद की संतुष्टि है।” उन्होंने यह भी कहा कि राज्यपाल को विधानसभा में पारित किसी भी बिल पर निर्णय लेने में टालमटोल या विलंब नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करता है। संवैधानिक जिम्मेदारी बनाम राजनीतिक हस्तक्षेप कर्नाटक सरकार का यह रुख इसलिए भी अहम है क्योंकि हाल के वर्षों में कई राज्यों में राज्यपाल और निर्वाचित सरकारों के बीच टकराव देखने को मिला है। कुछ मामलों में राज्यपालों द्वारा बिलों को लंबित रखना या मंजूरी में देरी करने की घटनाओं को राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देखा गया है। इस याचिका में इस बात की मांग की जा रही है कि अगर राज्यपाल या राष्ट्रपति तय समय के भीतर कोई निर्णय नहीं लेते, तो उसे स्वीकृत मान लिया जाए। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने अब तक सुनवाई के दौरान संकेत दिया है कि अदालत इस मुद्दे पर संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के संरक्षण को प्राथमिकता देगी। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या कार्यपालिका प्रमुखों को जवाबदेह बनाने के लिए समयसीमा तय की जा सकती है। कर्नाटक सरकार की यह दलील संवैधानिक व्यवस्था में राष्ट्रपति और राज्यपाल की भूमिका को लेकर एक बार फिर चर्चा में ला देती है। अगर सुप्रीम कोर्ट इस पर स्पष्ट दिशा-निर्देश देता है, तो यह भारत की संघीय राजनीति और राज्य-राज्यपाल संबंधों को लेकर नई संवैधानिक परिभाषा तय कर सकता है। Read More: Vice President election 2025: उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष को तगड़ा झटका, विपक्ष के 15 वोट अमान्य, क्रॉस वोटिंग ने चौंकाया

Karnataka vs Governor: सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के 14 सवालों के संदर्भ में सुनवाई के दौरान कर्नाटक सरकार ने बड़ा संवैधानिक बयान दिया। कांग्रेस शासित राज्य ने कहा कि भारत के संविधान के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल सिर्फ नाममात्र के प्रमुख हैं और वे केवल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य हैं।

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यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब संविधान पीठ यह विचार कर रही है कि क्या अदालतें राज्यपाल और राष्ट्रपति को किसी विधेयक (बिल) पर निर्णय लेने की समय-सीमा निर्धारित कर सकती हैं।

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क्या है मामला?

सुप्रीम कोर्ट की 5-जजों की संविधान पीठ, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई कर रहे हैं, राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए 14 संवैधानिक सवालों की जांच कर रही है। इनमें प्रमुख सवाल यह है कि क्या राज्यपाल और राष्ट्रपति को विधानसभा में पारित बिलों पर विचार करने के लिए एक निर्धारित समयसीमा के भीतर निर्णय लेना चाहिए?

कर्नाटक सरकार की दलील

कर्नाटक सरकार की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रमण्यम ने बेंच को बताया कि “संवैधानिक ढांचे में, राष्ट्रपति और राज्यपाल कार्यपालिका प्रमुख जरूर हैं, लेकिन वे स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं ले सकते। उनकी संतुष्टि का मतलब वास्तव में मंत्रिपरिषद की संतुष्टि है।”

उन्होंने यह भी कहा कि राज्यपाल को विधानसभा में पारित किसी भी बिल पर निर्णय लेने में टालमटोल या विलंब नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करता है।

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संवैधानिक जिम्मेदारी बनाम राजनीतिक हस्तक्षेप

कर्नाटक सरकार का यह रुख इसलिए भी अहम है क्योंकि हाल के वर्षों में कई राज्यों में राज्यपाल और निर्वाचित सरकारों के बीच टकराव देखने को मिला है। कुछ मामलों में राज्यपालों द्वारा बिलों को लंबित रखना या मंजूरी में देरी करने की घटनाओं को राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देखा गया है। इस याचिका में इस बात की मांग की जा रही है कि अगर राज्यपाल या राष्ट्रपति तय समय के भीतर कोई निर्णय नहीं लेते, तो उसे स्वीकृत मान लिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने अब तक सुनवाई के दौरान संकेत दिया है कि अदालत इस मुद्दे पर संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के संरक्षण को प्राथमिकता देगी। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या कार्यपालिका प्रमुखों को जवाबदेह बनाने के लिए समयसीमा तय की जा सकती है।

कर्नाटक सरकार की यह दलील संवैधानिक व्यवस्था में राष्ट्रपति और राज्यपाल की भूमिका को लेकर एक बार फिर चर्चा में ला देती है। अगर सुप्रीम कोर्ट इस पर स्पष्ट दिशा-निर्देश देता है, तो यह भारत की संघीय राजनीति और राज्य-राज्यपाल संबंधों को लेकर नई संवैधानिक परिभाषा तय कर सकता है।

Read More: Vice President election 2025: उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष को तगड़ा झटका, विपक्ष के 15 वोट अमान्य, क्रॉस वोटिंग ने चौंकाया

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