Presidential Reference Case : संविधान पर हमें गर्व, CJI गवई ने नेपाल का दिया उदाहरण, प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर सुप्रीम कोर्ट में जोरदार बहस

Presidential Reference Case : सुप्रीम कोर्ट में प्रेसिडेंशियल रेफरेंस को लेकर चल रही सुनवाई के नौवें दिन (बुधवार, 10 सितंबर) देश की संवैधानिक व्यवस्था, राज्यों और राज्यपालों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण बहस देखने को मिली। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश CJI गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने नेपाल संकट का जिक्र करते हुए भारत के संविधान की मजबूती को रेखांकित किया।

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यह टिप्पणी उस समय आई जब सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए संवैधानिक सवालों (Presidential Reference) पर विचार कर रहा था। यह रेफरेंस राज्यपालों की भूमिका और विधेयकों पर उनकी सहमति से जुड़े संवैधानिक मुद्दों को लेकर भेजा गया था।

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क्या है प्रेसिडेंशियल रेफरेंस?

अनुच्छेद 143 के तहत, राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांगी है कि क्या राज्यपाल को किसी विधेयक पर अनिश्चितकाल तक फैसला टालने का अधिकार है? इस संदर्भ में 14 संवैधानिक सवाल उठाए गए हैं।

केंद्र सरकार की दलीलें

सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से बहस करते हुए कहा कि राज्यपाल की सहमति महज औपचारिकता नहीं है, बल्कि वे विधायिका के आवश्यक अंग हैं। उन्होंने कहा कि राज्यपाल का यह कर्तव्य है कि वे संविधान की रक्षा और सुरक्षा करें। SG मेहता ने स्पष्ट किया कि वे यह नहीं कह रहे कि राज्यपाल किसी विधेयक पर अनिश्चितकाल तक बैठ सकते हैं, लेकिन अनुच्छेद 200 राज्यपाल को चार विकल्प देता है—सहमति देना, असहमति जताना, राष्ट्रपति के पास भेजना या पुनर्विचार के लिए वापस करना।

गैर-बीजेपी शासित राज्यों का विरोध

गैर-बीजेपी शासित राज्यों ने प्रेसिडेंशियल रेफरेंस का विरोध करते हुए कहा कि राज्यपालों द्वारा विधेयकों को रोकना संविधान की आत्मा के खिलाफ है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि भले ही तकनीकी रूप से यह मामला सही हो, लेकिन यह विषय संवेदनशील और जटिल है। CJI गवई ने कहा कि चूंकि यह मामला एक रेफरेंस है, इसलिए प्रत्युत्तर (Rejoinder) देने का सवाल नहीं उठता। यह सिर्फ सलाह लेने का मंच है, न कि किसी मुकदमे का।

आंध्र प्रदेश सरकार का रुख

दिलचस्प रूप से, आंध्र प्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार का समर्थन किया। उनके वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि वे केंद्र के सभी तर्कों से सहमत हैं, सिवाय इस एक बिंदु के कि राज्य सरकार अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दाखिल नहीं कर सकती।

सुनवाई में पेश हुईं कुछ खास बातें:

प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर बहस अब 25,000 पन्नों से अधिक की लिखित दलीलों तक पहुंच चुकी है।सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। पीठ में CJI बी.आर. गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर शामिल हैं।

भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिया गया बयान “हमें अपने संविधान पर गर्व है” इस बात की ओर संकेत करता है कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था, तमाम चुनौतियों के बावजूद, स्थिर और मजबूत बनी हुई है। प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर चल रही यह ऐतिहासिक सुनवाई भारतीय संघवाद, राज्यपाल की भूमिका और विधायी प्रक्रियाओं को लेकर न्यायिक दिशा तय कर सकती है।

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