Bagram Airbase Row: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया धमकी के बाद अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। ट्रंप ने ब्रिटेन यात्रा के दौरान बयान दिया कि अमेरिका जल्द ही बगराम एयरबेस को फिर से अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश करेगा। इसके जवाब में अफगानिस्तान ने सख्त लहजे में कहा है कि वह अपनी “एक मीटर भी जमीन” अमेरिका को नहीं देगा।

तालिबान का तीखा जवाब
अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी ने कहा है कि बगराम एयरबेस अफगानिस्तान की संप्रभुता का प्रतीक है और इसे किसी भी विदेशी ताकत को सौंपने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “हमारी धरती की एक इंच जमीन भी अमेरिका को नहीं दी जाएगी।”वहीं अफगान रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब मुजाहिद ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए चेतावनी दी, “हम अगले 20 साल तक युद्ध के लिए तैयार हैं, लेकिन अपनी जमीन किसी को नहीं देंगे।”

क्या है बगराम एयरबेस का मामला?
बगराम एयरबेस अफगानिस्तान का सबसे बड़ा और रणनीतिक दृष्टि से अहम एयरबेस है, जिसे अमेरिका ने 2001 में अपने सैन्य ऑपरेशनों के लिए तैयार किया था। यहां से अमेरिका ने अल-कायदा और तालिबान के खिलाफ बड़े हमले किए थे। लेकिन 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के साथ ही यह बेस तालिबान के नियंत्रण में चला गया।
डोनाल्ड ट्रंप ने इसे जो बाइडेन की “सबसे बड़ी गलती” करार दिया और कहा कि चीन की सीमा से सटे इस क्षेत्र में ड्रैगन की सक्रियता बढ़ गई है, जिससे अमेरिका की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।
दोहा समझौते का हवाला
तालिबान सरकार ने अमेरिका को 2020 में हुए दोहा समझौते की याद दिलाई, जिसमें अमेरिका ने अफगानिस्तान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने का वादा किया था। मुत्ताकी ने कहा कि वाशिंगटन को अब “यथार्थवादी और विवेकपूर्ण नीति” अपनानी चाहिए, न कि अतीत की असफल रणनीतियों को दोहराना।
अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ी
बगराम एयरबेस पर ट्रंप की आक्रामक नीति और तालिबान की सख्ती ने क्षेत्रीय तनाव को बढ़ा दिया है। अमेरिका की इस कोशिश को चीन और रूस भी बारीकी से देख रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि अगर अमेरिका दबाव बनाता है, तो यह मामला एक नए भू-राजनीतिक संकट का कारण बन सकता है।बगराम एयरबेस को लेकर ट्रंप और तालिबान सरकार के बीच तनातनी ने एक बार फिर अफगानिस्तान को वैश्विक सुर्खियों में ला दिया है। अफगान सरकार जहां अपनी संप्रभुता पर अडिग है, वहीं अमेरिका इसे रणनीतिक रूप से जरूरी ठहरा रहा है। आने वाले दिनों में यह मामला अंतरराष्ट्रीय मंच पर और गर्मा सकता है।
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