Fake Signature Case : पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के चयन के दौरान विधायकों के कथित फर्जी हस्ताक्षर (फर्जी दस्तखत) करने का मामला अब पूरी तरह से गरमा गया है। इस विवाद में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी की कानूनी मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। गुरुवार (11 जून, 2026) को इस बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय ने अपनी कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने इसे लोकतंत्र और विधायी प्रक्रिया से जुड़ा एक बेहद गंभीर मामला करार दिया है। हालांकि, कोर्ट ने अभिषेक बनर्जी को राहत देते हुए अगले तीन हफ्तों के लिए उनकी गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी है।

सीआईडी के तीन समन पर भी नहीं हुए थे पेश
लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले की जांच कर रही पश्चिम बंगाल की सीआईडी (CID) अब तक अभिषेक बनर्जी को पूछताछ के लिए तीन बार समन जारी कर चुकी है। हालांकि, वह एक बार भी जांच एजेंसी के समक्ष उपस्थित नहीं हुए और उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज मामले को पूरी तरह से खारिज कराने के लिए हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर दी थी। अदालत में सुनवाई के दौरान अभिषेक बनर्जी के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल सीआईडी की जांच में पूरा सहयोग करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते अदालत उन्हें दंडात्मक कार्रवाई और गिरफ्तारी से सुरक्षा (प्रोटेक्शन) प्रदान करे।

विधानसभा की पवित्रता का मामला
मामले की गंभीरता को देखते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और सीआईडी के तर्कों को ध्यान से सुना। जांच एजेंसी ने अदालत को बताया कि यह केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर विधानसभा की पवित्रता और मर्यादा से जुड़ा हुआ मामला है, जिसकी निष्पक्ष जांच होनी अनिवार्य है। इस पर सहमति व्यक्त करते हुए अदालत ने सीआईडी को पूरी तत्परता से जांच आगे बढ़ाने और जल्द से जल्द कोर्ट में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया। जांच एजेंसी ने यह भी दावा किया कि उनके पास पुख्ता सबूत हैं कि यह कृत्य अभिषेक बनर्जी द्वारा ही किया गया है, इसलिए वे अब गवाह नहीं बल्कि मुख्य आरोपी हैं।
अभिषेक बनर्जी ने दी दलील
अभिषेक बनर्जी की तरफ से कोर्ट में यह दलील दी गई कि विधानसभा के भीतर विपक्ष का नेता चुनने का अंतिम अधिकार और फैसला केवल पार्टी के विधायकों का ही था। उन्होंने कहा कि वे तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव जरूर हैं, लेकिन वे खुद पश्चिम बंगाल विधानसभा के सदस्य (विधायक) नहीं हैं और न ही वह उस विवादित बैठक का हिस्सा थे। इस पर जब अदालत ने उनसे सवाल किया कि यदि वे बैठक में नहीं थे, तो उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) को विपक्ष के नेता के नाम का आधिकारिक प्रस्ताव क्यों भेजा? इसके जवाब में अभिषेक बनर्जी ने कहा कि पार्टी का शीर्ष पदाधिकारी होने के नाते उन्होंने केवल प्रशासनिक दायित्व निभाया था।
बंगाल सरकार ने कोर्ट में खोली पोल
अदालत में पश्चिम बंगाल सरकार के वकीलों ने अभिषेक बनर्जी के दावों का पुरजोर विरोध किया और कई चौंकाने वाले खुलासे किए। सरकार ने कोर्ट को बताया कि टीएमसी की तरफ से स्पीकर को भेजे गए प्रस्ताव पत्र पर 6 मई की तारीख दर्ज है, जबकि वास्तविकता यह है कि 6 मई को टीएमसी विधायकों की ऐसी कोई आधिकारिक बैठक हुई ही नहीं थी। विधायकों की बैठक वास्तव में 19 मई को आयोजित की गई थी। सरकार ने कहा कि खुद टीएमसी के कई विधायक यह गवाही दे रहे हैं कि उन्होंने 6 मई वाले किसी भी प्रस्ताव पत्र पर अपने हस्ताक्षर नहीं किए हैं। जब स्पीकर ने बैठक का विवरण मांगा, तब आनन-फानन में दोबारा बैठक बुलाकर फर्जीवाड़ा छिपाने की कोशिश की गई।
दो टीएमसी विधायकों की शिकायत के बाद शुरू हुई सीआईडी जांच
यह पूरा विवाद उस समय सार्वजनिक हुआ जब तृणमूल कांग्रेस ने विधानसभा के अध्यक्ष को पत्र लिखकर शोभनदेब चट्टोपाध्याय को सदन में विपक्ष का नेता नियुक्त करने का प्रस्ताव भेजा। दावा किया गया था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास पर आयोजित एक बैठक में सभी विधायकों की सहमति से यह फैसला लिया गया था। हालांकि, खेल तब बिगड़ गया जब टीएमसी के ही दो मौजूदा विधायकों- ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह से झूठा बताते हुए बगावत कर दी। उन्होंने दावा किया कि कुल 70 हस्ताक्षरों में से कम से कम 14 विधायकों के दस्तखत पूरी तरह फर्जी हैं। इसके बाद विधानसभा के प्रधान सचिव की शिकायत पर सीआईडी ने यह आपराधिक मामला दर्ज किया था।
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