Ranga Billa Case : सच्ची घटना पर आधारित राख सीरीज, इस में छुपा है दिल्ली का सबसे बड़ा रहस्य

Ranga Billa Case : भारतीय दर्शकों के बीच क्राइम थ्रिलर जॉनर का क्रेज हमेशा सातवें आसमान पर रहता है। एक अच्छी तरह से पर्दे पर उतारी गई पुलिस इन्वेस्टिगेशन में कुछ ऐसा जादू होता है, जो दर्शकों को अंत तक अपनी सीटों से बांधकर रखता है, भले ही उन्हें कहानी के अंजाम का पहले से अंदाजा हो। जब कोई वेब सीरीज भारत के सबसे भयानक और ऐतिहासिक वास्तविक अपराध पर आधारित हो, तो दर्शकों की उम्मीदें दोगुनी हो जाती हैं। नई वेब सीरीज ‘राख’ साल 1978 के उस खूंखार और रूह कंपा देने वाले रंगा-बिल्ला अपहरण और हत्याकांड पर आधारित है, जिसने दशकों पहले पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। ऐसी संवेदनशील घटना को दोबारा स्क्रीन पर दिखाना बेहद चुनौतीपूर्ण काम है, क्योंकि यह आज भी लोगों की भावनाओं से जुड़ा है, लेकिन निर्देशक प्रोसिट रॉय ने इस मुश्किल काम को बखूबी अंजाम दिया है।

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‘राख’ की कहानी

कहानी की शुरुआत दो मासूम बच्चों के साथ होती है, जो एक बेहद सामान्य दिन की तरह अपने घर से ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन के लिए निकलते हैं, लेकिन वे कभी वहां पहुंच नहीं पाते। बच्चों के अचानक गायब होने से परिवार में कोहराम मच जाता है और बेबस माता-पिता (सोनाली बेंद्रे और आमिर बशीर) मदद की गुहार लेकर पुलिस के चक्कर काटने लगते हैं। इस हाई-प्रोफाइल केस की जांच की कमान युवा सब-इंस्पेक्टर जयप्रकाश (अली फजल) को सौंपी जाती है, जिनका यह पहला बड़ा केस है।

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ड्यूटी की चुनौतियों के साथ-साथ उन्हें अपने रिटायर्ड कांस्टेबल पिता (राकेश बेदी) के लाड-प्यार से भी निपटना पड़ता है, जो अक्सर थाने में मटन करी लेकर पहुंच जाते हैं ताकि उनके बेटे का मान-सम्मान बना रहे। कड़े सर्च ऑपरेशन के बाद दोनों बच्चों के शव एक सुनसान पहाड़ी इलाके में लावारिस मिलते हैं, जिसके बाद पुलिस कुख्यात अपराधियों बाबू और रज्जो यानी रंगा और बिल्ला की तलाश में जुट जाती है।

कड़क डायलॉग्स और शानदार परफॉर्मेंस

यह सीरीज किसी भी तरह के घिसे-पिटे या भारी-भरकम वन-लाइनर्स और लंबे भाषणों पर बिल्कुल निर्भर नहीं करती। इसके विपरीत, इसकी ताकत इसके सन्नाटे, ठहराव और दृश्यों के बीच का तनाव है। अली फजल ने एसआई जयप्रकाश के रूप में बेहद नियंत्रित और सधा हुआ अभिनय किया है। उन्होंने एक नए पुलिस अफसर की उस बेबसी और छटपटाहट को बिना किसी लाउड ड्रामे के स्क्रीन पर उतारा है, जो अपनी व्यक्तिगत उलझनों के बीच एक खौफनाक केस को सुलझाने की कोशिश कर रहा है।

वहीं, लंबे समय बाद वापसी कर रही सोनाली बेंद्रे एक पीड़ित मां के रूप में दिल तोड़ने वाला अभिनय करती हैं, जिनकी हंसती-खेलती दुनिया अचानक तबाह हो जाती है। आमिर बशीर ने एक ऐसे मजबूत पिता का किरदार निभाया है जो अंदर से पूरी तरह टूट चुका है, फिर भी अपनी पत्नी को संबल देता है। राकेश बेदी और दिब्येंदु भट्टाचार्य ने भी अपने छोटे लेकिन महत्वपूर्ण किरदारों में गहरी छाप छोड़ी है।

रंगा और बिल्ला के रूप में मुख्य विलेन

इस सीरीज का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला सरप्राइज पैकेज आकाश मखीजा और रमनदीप यादव की जोड़ी है, जिन्होंने क्रमशः रंगा और बिल्ला के मुख्य नकारात्मक किरदारों को जीवंत किया है। इन दोनों युवा अभिनेताओं की स्क्रीन प्रेजेंस और एक्टिंग इतनी डरावनी और विचलित करने वाली है कि दर्शक असहज महसूस करने लगते हैं। वे सिर्फ प्रभाव डालने के लिए विलेन नहीं बने हैं, बल्कि उन्होंने इन खूंखार हत्यारों की साइकोपैथ और बीमार सोच को बहुत ही सहजता से आत्मसात किया है। यदि उनकी मौजूदगी आपको परदे पर डराती है, तो यह उनकी अभिनय क्षमता की सबसे बड़ी जीत है।

प्रोसिट रॉय का बेहतरीन डायरेक्शन

निर्देशक प्रोसिट रॉय इस बात के लिए विशेष रूप से तारीफ के पात्र हैं कि उन्होंने इस संवेदनशील और जघन्य मामले को केवल सनसनीखेज मसाला बनाने के लालच से खुद को दूर रखा। उन्होंने इसे एक लाउड ड्रामेटिक तमाशा बनाने के बजाय तथ्यों, पुलिस फाइलों और वास्तविक मानवीय भावनाओं को खुद अपनी कहानी बयां करने की आजादी दी। इस सीरीज की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह केवल जांच करने वाले पुलिस वाले को ही हीरो नहीं बनाती, बल्कि अपराधियों के बैकग्राउंड और अपराध करने से पहले की उनकी खतरनाक मानसिकता को भी गहराई से टटोलती है। अगर आप इसे रात के सन्नाटे में देखने की सोच रहे हैं, तो यह तय है कि स्क्रीन बंद होने के बाद भी इसकी खौफनाक दुनिया आपके दिमाग से आसानी से नहीं निकलेगी।

कुछ कमजोर कड़ियां और फाइनल वर्डिक्ट

कमियों की बात करें तो कहानी में दिखाया गया एक जर्नलिस्ट (पत्रकार) का सब-प्लॉट मुख्य कहानी की रफ्तार को थोड़ा धीमा करता है और उसे थोड़ा छोटा किया जा सकता था। इसके अलावा कुछ जगहों पर कहानी के कुछ सवाल अधूरे रह जाते हैं, जो दर्शकों को थोड़ा खटक सकते हैं। हालांकि, ये छोटी-मोटी खामियां सीरीज के ओवरऑल इम्पैक्ट को कम नहीं करतीं। कुल मिलाकर ‘राख’ एक बेहद दमदार, ईमानदार और झकझोर देने वाली बेहतरीन इन्वेस्टिगेटिव क्राइम थ्रिलर है, जिसे उम्दा अभिनय और रियलिस्टिक मेकिंग के लिए जरूर देखा जाना चाहिए। हमारी तरफ से इस शानदार सीरीज को 5 में से 3.5 स्टार।

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Chandan Das

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